सेवानिवृत्त आरपीएफ कर्मी से वसूली की कार्यवाही रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

रेलवे सुरक्षा बल के एक सेवानिवृत्त उप-निरीक्षक ने अपनी अंतिम वेतन में की गई कटौती तथा कथित अधिक भुगतान की गई वेतन-राशि की वसूली को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि रेल प्रशासन 15 वर्ष बाद बिना पूर्व सूचना दिए न तो उनका पेंशन घटा सकता है और न ही राशि की वसूली कर सकता है। न्यायालय ने उनका अंतिम वेतन बहाल करने और वसूल की गई राशि लौटाने का आदेश दिया। अवकाश नकदीकरण से संबंधित उनकी अलग शिकायत को पहले ही निस्तारित माना गया।

मामले की पृष्ठभूमि

याची ने विधिवत चयन के उपरांत 06.03.1978 को रेलवे सुरक्षा बल में कॉन्स्टेबल के रूप में नियुक्ति प्राप्त की। वर्षों के दौरान उन्होंने कई स्थानों पर सेवा की और अपनी सेवा के सामान्य क्रम में पदोन्नतियां प्राप्त कीं।

उन्हें कॉन्स्टेबल से प्रधान कॉन्स्टेबल के पद पर पदोन्नत किया गया और 28.08.1995 को कारशेड आरपीएफ, सोनारपुर (सीलदह मंडल के अधीन) से पूर्व रेलवे के आसनसोल मंडल में स्थानांतरित कर दिया गया। बाद में, 08.01.2005 को उन्हें सहायक उप-निरीक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया और उसी तिथि से प्रभावी रूप से मुख्यालय, हाजीपुर में क्वार्टर मास्टर सेल में पदस्थापित किया गया।

वर्ष 2014 में, 20.04.2014 को उन्हें आरपीएफ पोस्ट, पटना से सी एंड टी कंपनी, दानापुर में स्थानांतरित कर दिया गया। 01.04.2017 को उन्हें पुनः पदोन्नत किया गया, इस बार उप-निरीक्षक के पद पर। 26.03.2018 को उन्हें सुरक्षा नियंत्रण, आरपीएफ, दानापुर में पदस्थ किया गया। अंततः वे इसी पद से 30.11.2018 को अधिवार्षिक सेवानिवृत्त हुए।

याची के अनुसार, सेवानिवृत्ति की तिथि को वे 50,500/- रुपये का मूल वेतन प्राप्त कर रहे थे। सेवानिवृत्ति के पश्चात, उनकी पेंशन निर्धारण तथा सेवानिवृत्ति लाभों के निर्गमन के लिए पेंशन संबंधी कागजात और आवश्यक दस्तावेज प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

किन्तु उनकी पेंशन 50,500/- रुपये के अंतिम मूल वेतन पर निर्धारित करने के स्थान पर, प्राधिकारियों ने उनके मूल वेतन को 49,000/- रुपये माना, जो उन्होंने 01.07.2017 को, यानि 17 माह पूर्व, प्राप्त किया था। परिणामस्वरूप, उनकी मूल पेंशन 24,500/- रुपये निर्धारित की गई। उन्हें अवकाश नकदीकरण भी केवल 266 दिन LAP (Leave Admissible Pay) और 34 दिन की आधी अवकाश नकदीकरण के रूप में प्राप्त हुआ, जबकि उनका दावा 300 दिन के पूर्ण अवकाश नकदीकरण का था।

इसके अतिरिक्त, कार्यालय डी.ओ. सं. 307/2018 दिनांक 28.11.2018 द्वारा, 01.07.2018 को उनके मूल वेतन का पुनरीक्षण कर 49,000/- रुपये पर पुनर्निर्धारण किया गया। इसी आधार पर कथित अधिक भुगतान के रूप में उनसे 94,416/- रुपये की राशि वसूल की गई।

अपने को पीड़ित मानते हुए, याची ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत पटना उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र का आह्वान करते हुए सीडब्ल्यूजेसी सं. 2850/2021 दायर किया। उन्होंने अपने मूल वेतन में की गई कटौती एवं पुनर्निर्धारण, परिणामी पेंशन में कमी, 94,416/- रुपये की वसूली तथा 300 दिन के पूर्ण अवकाश नकदीकरण से वंचित किए जाने, सभी को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद यह था कि क्या रेल प्रशासन, याची की सेवानिवृत्ति के बाद, 01.12.2003 से उनका वेतन पुनरावलोकित कर सकता है, अंतिम मूल वेतन घटा सकता है, उस घटे वेतन पर पेंशन निर्धारित कर सकता है, तथा सेवानिवृत्ति देयों से 94,416/- रुपये की कथित अधिक भुगतान की गई राशि वसूल कर सकता है।

याची के अधिवक्ता का तर्क था कि अधिवार्षिक सेवानिवृत्ति के समय वे 50,500/- रुपये का मूल वेतन प्राप्त कर रहे थे और उनकी पेंशन उसी अंतिम वेतन पर निर्धारित की जानी चाहिए थी। उनकी संपूर्ण सेवा अवधि में कभी भी उनके विरुद्ध धोखाधड़ी या मिथ्याप्रस्तुति का कोई आरोप नहीं रहा, न ही उनका वेतन घटाने या वसूली करने से पूर्व उन्हें कोई कारण बताओ सूचना (शो-कॉज नोटिस) या सुनवाई का अवसर दिया गया।

अवकाश नकदीकरण के मुद्दे पर, याची का कहना था कि वे 300 दिन के अवकाश नकदीकरण के हकदार थे, परंतु उन्हें केवल 266 दिन LAP और 34 दिन HLAP के लिए ही भुगतान किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान उनके अधिवक्ता ने न्यायालय को सूचित किया कि रिट याचिका की लंबितावस्था के दौरान यह शिकायत दूर कर दी गई है।

कानून के प्रश्न पर, याची ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of Punjab and Others vs. Rafiq Masih (White Washer) and Others, (2015) 4 SCC 334 पर विशेष रूप से निर्भर किया। उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ विशिष्ट स्थितियां प्रतिपादित की हैं जिनमें कर्मचारियों से अधिक भुगतान की वसूली कानूनन अस्वीकार्य होगी, विशेषकर तब जब वसूली सेवानिवृत्त कर्मचारियों से की जा रही हो या जब वसूली आदेश से पूर्व पांच वर्ष से अधिक समय तक अतिरिक्त भुगतान जारी रहा हो।

याची ने Thomas Danial vs. State of Kerala and Others, 2022 SCC OnLine SC 536 का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राज्य सरकार 10 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद अतिरिक्त वेतनवृद्धि के कारण दी गई अधिक राशि की वसूली नहीं कर सकती।

यह रेखांकित करने के लिए कि वेतन में कटौती और किसी सरकारी कर्मचारी से राशि की वसूली एक गंभीर तथा दंडात्मक कार्रवाई है, जिसके लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है, याची ने Jagdish Prasad Singh vs. State of Bihar and Others, 2024 SCC OnLine SC 1909 का सहारा लिया। उस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी प्रकार की वसूली और पेंशन में कटौती को निरस्त कर, पूर्व वेतनमान एवं पेंशन की पुनर्बहाली का, उपयुक्त ब्याज सहित, निर्देश दिया था।

याची ने पटना उच्च न्यायालय की समन्वय पीठों के दो निर्णयों – Akhilanand Upadhyay vs. The State of Bihar & Ors., 2010(4) PLJR 854 तथा Dashrath Singh vs. The Accountant General, Bihar & Ors., 2016(4) PLJR 497 – का भी हवाला दिया। इन निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया गया कि वेतनमान में कटौती या कोई भी प्रतिकूल वित्तीय कार्रवाई, बिना सुनवाई का अवसर दिए, नहीं की जा सकती और यह कि पेंशनरी लाभ अंतिम वेतन के आधार पर ही निर्धारित किए जाने चाहिए, न कि किसी एकपक्षीय रूप से घटाए गए वेतनमान पर।

रिट याचिका का विरोध करते हुए, भारत संघ के अधिवक्ता ने घटनाक्रम का अपना पक्ष रखा। उनके अनुसार, 01.12.2003 को याची का मूल वेतन 4,300/- रुपये निर्धारित किया गया था, लेकिन उसी तिथि को उन्हें एक अतिरिक्त वेतनवृद्धि गलती से दे दी गई, जिससे उनका वेतन 4,400/- रुपये हो गया। उनके मुताबिक यह दोहरी वेतनवृद्धि दिए जाने की भूल थी।

01.12.2003 की इस त्रुटिपूर्ण वेतन निर्धारण को आगे के वर्षों में भी जारी रखा गया, जिसके कारण याची का वेतन उस उच्च आधार पर बढ़ता रहा, जिसके वे विधिसम्मत पात्र नहीं थे। जब उनकी सेवानिवृत्ति निकट आई, तो उनका सेवा अभिलेख 01.11.2018 को अंतिम वेतन के सत्यापन के लिए वरिष्ठ मंडलीय वित्त प्रबंधक, पूर्व मध्य रेलवे, दानापुर को भेजा गया।

जांच के दौरान, वित्त प्राधिकार ने 01.12.2003 की दोहरी वेतनवृद्धि पर ध्यान दिया और निर्देश दिया कि 01.12.2003 से लेकर अधिवार्षिक सेवानिवृत्ति तक याची के वेतन की पुनर्समीक्षा व पुनर्निर्धारण किया जाए। उन्होंने यह भी इंगित किया कि यदि वेतन का संशोधन किया जाता है तो 6वें और 7वें केंद्रीय वेतन आयोग के लाभों का भी पुन: गणना किया जाना होगा।

इसके पश्चात, 01.12.2003 को उनके मूल वेतन की पुनर्समीक्षा की गई और एक वेतनवृद्धि घटा दी गई। 6वें एवं 7वें वेतन आयोग के अंतर्गत उनका वेतन निर्धारण उसी आधार पर पुन: किया गया और अंततः 01.07.2018 को उनका मूल वेतन 49,000/- रुपये पुनर्निर्धारित किया गया। इस संशोधित वेतन के आधार पर प्राधिकारियों ने 94,416/- रुपये की वसूली, अधिक भुगतान के रूप में, का आदेश पारित किया।

अवकाश नकदीकरण के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि अद्यतन अवकाश अभिलेख के अनुसार, सेवानिवृत्ति के समय याची के पास 266 दिन LAP तथा 460 दिन HLAP शेष थे। इनमें से 266 दिन LAP और 34 दिन HLAP का नकदीकरण किया गया, जो कुल 300 दिन होता है, और उन्हें 5,03,835/- रुपये की राशि दी गई।

भारत संघ का तर्क था कि याची को यह ज्ञान था कि 2003 में उन्हें एक अतिरिक्त वेतनवृद्धि दी गई है, फिर भी उन्होंने उसका संशोधन कराने की कोई पहल नहीं की। उन्होंने Union of India & Others vs. Bhanwar Lal Mundan, (2013) 12 SCC 433 पर निर्भरता जताई, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि प्राधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद भी वेतन निर्धारण में हुई त्रुटि को सुधारने का अधिकार रखते हैं और यह कि पेंशन किसी गलत तरीके से बढ़े हुए वेतन के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती।

उन्होंने Syed Abdul Qadir & Ors. vs. State of Bihar & Ors., (2009) 3 SCC 475 का भी संदर्भ दिया, जिसमें यह माना गया कि यदि कर्मचारी को अधिक भुगतान के बारे में जानकारी हो या यदि भूल कम समय के भीतर सुधारी जाए, तो वसूली की जा सकती है। इसके अतिरिक्त इस न्यायालय के Kailash Bhushan Tiwari vs. The State of Bihar & Ors. (CWJC No. 7961 of 2020) और Uma Devi vs. The State of Bihar & Ors. (LPA No. 975 of 2019) के निर्णयों पर भी भरोसा किया गया, जिनमें तथ्यों से यह प्रतीत होता था कि कर्मचारियों को अधिक भुगतान की जानकारी थी या उन्होंने इसके संबंध में प्रतिज्ञान (अंडरटेकिंग) दिया था।

दोनों पक्षों को सुनने और अभिलेख का परीक्षण करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने यह पाया कि 01.12.2003 को वाकई एक अतिरिक्त वेतनवृद्धि दी गई थी, और इसी से याची को शेष सेवा अवधि में अधिक वेतन मिलने लगा। हालांकि, न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर बल दिया।

प्रथम, अतिरिक्त वेतनवृद्धि याची की किसी मिथ्याप्रस्तुति या धोखाधड़ी के कारण नहीं दी गई थी। द्वितीय, अभिलेख से यह नहीं प्रतीत होता कि याची को यह जानकारी थी कि उन्हें जो भुगतान किया जा रहा है, वह अधिक या गलत है। तृतीय, यह त्रुटि 2003 में हुई थी, लेकिन इसे सुधारने का निर्देश केवल 2018 में, अर्थात लगभग 15 वर्ष बाद और सेवानिवृत्ति के मुहाने पर, दिया गया।

Syed Abdul Qadir मामले का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने यह सिद्धांत उद्धृत किया कि जब कर्मचारी की ओर से कोई मिथ्याप्रस्तुति या धोखाधड़ी न हो और जब लंबे समय तक अधिक भुगतान होता रहा हो, तो सामान्यतः ऐसी राशि की वसूली निषिद्ध होती है। न्यायालय ने Rafiq Masih निर्णय में प्रतिपादित महत्वपूर्ण दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, विशेष रूप से यह कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों से या जहां वसूली आदेश से पूर्व पांच वर्ष से अधिक समय तक अधिक भुगतान जारी रहा हो, ऐसी वसूली कानूनन अस्वीकार्य है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि पहले से सेवानिवृत्त कर्मचारी से, जिसने 15 वर्षों तक यह अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया हो, वसूली का आदेश देना अन्यायपूर्ण, मनमाना और कठोर होगा। अतः ऐसी वसूली को न्यायालय ने विधि-विरुद्ध माना।

इसके बाद न्यायालय ने यह विचार किया कि क्या इस स्तर पर संशोधित, कम वेतन के आधार पर याची की पेंशन का पुनर्निर्धारण किया जा सकता है। न्यायालय ने स्वीकार किया कि नियोक्ता को सेवानिवृत्ति के बाद भी पेंशन निर्धारण में हुई त्रुटि सुधारने की शक्ति होती है, परंतु यह शक्ति कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए ही प्रयोग की जा सकती है।

इस मामले में, किसी भी स्तर पर याची का वेतन घटाने और राशि की वसूली करने से पहले कोई कारण बताओ सूचना जारी नहीं की गई। Akhilanand Upadhyay और Dashrath Singh के समन्वय पीठ के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने दोहराया कि किसी व्यक्ति के वेतन या पेंशन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कोई भी आदेश, बिना उसका पक्ष सुने, पारित नहीं किया जा सकता; ऐसी कोई कार्रवाई प्रारंभ से ही शून्य (void ab initio) होगी।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय Jagdish Prasad Singh से भी बल ग्रहण किया। उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने वेतनमान में कटौती और सरकारी कर्मचारी से राशि की वसूली को गंभीर नागरिक परिणामों वाली दंडात्मक कार्रवाई बताया, जिसे सेवानिवृत्ति के कई वर्ष बाद, प्राकृतिक न्याय की अवहेलना करते हुए, नहीं किया जा सकता। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पेंशन में कटौती तथा वसूली को निरस्त कर, पूर्व वेतनमान के आधार पर पेंशन जारी रखने का निर्देश दिया था।

इसके विपरीत, भारत संघ द्वारा उद्धृत निर्णय, जैसे Bhanwar Lal Mundan, Kailash Bhushan Tiwari और Uma Devi, भिन्न तथ्यात्मक परिस्थितियों से संबंधित थे, जहां कर्मचारियों को अधिक भुगतान की जानकारी थी, उन्होंने प्रतिज्ञान पत्र दिए थे, या उन्होंने स्पष्ट रूप से अधिक राशि प्राप्त होने की बात छुपाई थी। अतः वे निर्णय वर्तमान मामले में प्रतिवादियों की सहायता नहीं कर सके।

इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याची के वेतनमान में संशोधन तथा 94,416/- रुपये की वसूली का आदेश, जो रिट याचिका में परिशिष्ट-4 के रूप में संलग्न है, विधिसम्मत नहीं रह सकता।

न्यायालय ने तदनुसार विवादित आदेश को निरस्त कर दिया। प्राधिकारियों को निर्देश दिया गया कि सेवानिवृत्ति के समय याची द्वारा प्राप्त किए जा रहे अंतिम वेतन को बहाल किया जाए और वसूल की गई 94,416/- रुपये की राशि, निर्णय की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से अधिमानतः आठ सप्ताह के भीतर, वापस की जाए।

जहां तक 300 दिन के अवकाश नकदीकरण के दावे का संबंध है, न्यायालय ने याची के अधिवक्ता के इस कथन को दर्ज किया कि रिट याचिका की लंबितावस्था के दौरान यह शिकायत पहले ही दूर की जा चुकी है, अतः न्यायालय ने इस मुद्दे पर आगे विचार नहीं किया।

अंत में, रिट याचिका को उक्त सीमा तक स्वीकार किया गया, अर्थात वेतन पुनरीक्षण एवं वसूली के आदेश को निरस्त करते हुए अंतिम वेतन की बहाली और वसूल की गई राशि की वापसी का निर्देश दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय सेवानिवृत्त और शीघ्र सेवानिवृत्त होने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए, विशेषकर निम्न एवं मध्यम वर्गीय कर्मचारियों के लिए, महत्वपूर्ण है, जिन्हें अक्सर सेवानिवृत्ति के समय या उसके ठीक पहले अचानक पेंशन घटाने या वसूली के नोटिसों का सामना करना पड़ता है।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब लंबे समय तक कर्मचारी की किसी गलती के बिना, और उसकी ओर से किसी धोखाधड़ी या मिथ्याप्रस्तुति के बिना, अतिरिक्त वेतन दिया जाता रहा हो, तो नियोक्ता सेवानिवृत्ति के समय अचानक उन राशियों की वसूली नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति का वेतन या पेंशन घटाना और उसकी सेवानिवृत्ति-लाभ राशि से वसूली करना कोई साधारण प्रशासनिक सुधार नहीं है। यह एक गंभीर और कठोर कदम है, जिसके गहन वित्तीय परिणाम होते हैं, इसलिए कर्मचारी को पूर्व सूचना और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिया जाना अनिवार्य है।

कई सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिए, जो पूर्णतः पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों पर निर्भर रहते हैं, यह निर्णय विभागों द्वारा विलंबित और एकतरफा सुधारात्मक कार्रवाइयों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह Rafiq Masih, Syed Abdul Qadir, Thomas Daniel और Jagdish Prasad Singh जैसे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों को दृढ़ करता है और उन्हें विशेष रूप से रेलवे तथा अन्य सरकारी सेवाओं के संदर्भ में स्पष्ट रूप से लागू करता है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या रेल प्रशासन, 15 वर्ष बाद, किसी कर्मचारी के वेतन को पूर्व प्रभाव से संशोधित कर, उसका अंतिम वेतन घटा सकता है और उसकी सेवानिवृत्ति देयों से, जबकि उसकी ओर से कोई धोखाधड़ी या मिथ्याप्रस्तुति न हो और कोई पूर्व सूचना भी न दी गई हो, कथित अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली कर सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसी वसूली और वेतन में कटौती, Rafiq Masih, Syed Abdul Qadir एवं अन्य निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांतों के विरुद्ध होने के कारण अन्यायपूर्ण, मनमानी और कठोर है तथा प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन (क्योंकि सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया) के दोष से ग्रस्त है। विवादित आदेश को निरस्त कर अंतिम वेतन की बहाली व वसूल की गई राशि की वापसी का निर्देश दिया गया।
  • प्रश्न: क्या नियोक्ता, बिना कोई कारण बताओ सूचना जारी किए या कर्मचारी को सुने, सेवानिवृत्ति के बाद कम स्वीकृत वेतन के आधार पर पेंशन का पुनर्निर्धारण कर सकता है?
    उत्तर: नहीं। यद्यपि नियोक्ता पेंशन निर्धारण में हुई त्रुटियों को सुधार सकता है, परंतु वेतन या पेंशन में किसी भी प्रतिकूल परिवर्तन हेतु विधि और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है। बिना सूचना या सुनवाई के की गई ऐसी कार्रवाई शून्य और अवहनीय होगी।
  • प्रश्न: क्या याची के 300 दिन के अवकाश नकदीकरण संबंधी दावे का न्यायालय द्वारा निर्णय किया जाना आवश्यक था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने याची के अधिवक्ता का यह कथन दर्ज किया कि रिट याचिका लंबित रहने के दौरान अवकाश नकदीकरण की शिकायत पहले ही दूर कर दी गई है, अतः इस मुद्दे पर कोई निर्णय आवश्यक नहीं था।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Syed Abdul Qadir & Ors. vs. State of Bihar & Ors., (2009) 3 SCC 475
  • State of Punjab & Ors. vs. Rafiq Masih (White Washer) & Ors., (2015) 4 SCC 334
  • Thomas Daniel vs. State of Kerala & Ors., 2022 SCC OnLine SC 536
  • Jagdish Prasad Singh vs. State of Bihar & Ors., 2024 SCC OnLine SC 1909
  • ITC Limited vs. State of U.P. & Ors., 2011 (7) SCC 493 (Jagdish Prasad Singh में संदर्भित)
  • Union of India & Ors. vs. Bhanwar Lal Mundan, (2013) 12 SCC 433
  • Punjab National Bank vs. Manjeet Singh, (2006) 8 SCC 647
  • Bihar SEB vs. Bijay Bhadur, (2000) 10 SCC 99
  • Sahib Ram vs. State of Haryana, 1995 Supp (1) SCC 18
  • Shyam Babu Verma vs. Union of India, (1994) 2 SCC 521
  • Union of India vs. M. Bhaskar, (1996) 4 SCC 416
  • V. Gangaram vs. Director, (1997) 6 SCC 139
  • Col. B.J. Akkara (Retd.) vs. Government of India, (2006) 11 SCC 709
  • Purshottam Lal Das vs. State of Bihar, (2006) 11 SCC 492
  • Akhilanand Upadhyay vs. The State of Bihar & Ors., 2010(4) PLJR 854
  • Dashrath Singh vs. The Accountant General, Bihar & Ors., 2016(4) PLJR 497
  • Kailash Bhushan Tiwari vs. The State of Bihar & Ors., CWJC No. 7961 of 2020 (पटना उच्च न्यायालय)
  • Uma Devi vs. The State of Bihar & Ors., L.P.A. No. 975 of 2019 (पटना उच्च न्यायालय)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 2850 of 2021

मामले का शीर्षक: Ram Lakhan Singh vs. The Union of India & Ors.

उद्धरण: 2024(4) PLJR 369

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar

निर्णय की तिथि: 23.09.2024

याची की ओर से अधिवक्ता: Mr. Ramchandra Singh, Mr. Jitendra Kumar Singh, Mr. Shankar Kumar, Mr. Surajbans Rai, Advocates

प्रतिवादियों (भारत संघ एवं रेलवे प्राधिकार) की ओर से अधिवक्ता: Mr. Maurya Vijay Chandra, Sr. CGC; Dr. Priya Gupta, CGC

मामले की प्रकृति: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद वेतन में कटौती, पेंशन के पुनर्निर्धारण तथा कथित अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली को, साथ ही अवकाश नकदीकरण से जुड़ी मांग को, चुनौती दी गई।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यदि यह व्याख्या आपके लिए उपयोगी रही हो और आप बिहार में विधिक विकासों के बारे में, जो आपके अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं, नियमित जानकारी पाना चाहें, तो आप Samvida Law Associates को आगे के अद्यतनों के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News