मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 19.06.2012 दिनांकित आदेश द्वारा परिवीक्षा पर सिविल जज (कनिष्ठ शाखा) के रूप में बिहार न्यायिक सेवा में नियुक्त किया गया और उसने 16.08.2012 को न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में ज्वाइन किया। उसकी सेवाओं की पुष्टि 2019 में हुई और 12.12.2019 को उसे सिविल जज (वरिष्ठ शाखा) के रूप में पदोन्नत किया गया।
पदोन्नति के बाद, उसे सब-जज-III सह ACJM, पटना सिटी के रूप में तैनात किया गया और तत्पश्चात सेवा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऐसी तैनाती की अनुमति देने वाले स्थायी समिति के संकल्प के अनुसार उसे प्रधान न्यायिक मजिस्ट्रेट, Juvenile Justice Board (JJB), पटना के रूप में पदस्थापित किया गया।
प्रधान न्यायिक मजिस्ट्रेट, JJB, पटना के रूप में कार्य करते समय उसके आचरण और बोर्ड के कामकाज के तरीके के संबंध में कई शिकायतें प्राप्त हुईं। पटना उच्च न्यायालय की Juvenile Justice मॉनिटरिंग समिति ने JJB और Observation Home, पटना का निरीक्षण किया, निर्देश जारी किए, और बाद में अनुपालन न होने तथा गंभीर अनियमितताओं की रिपोर्ट की।
15.10.2020 को, मॉनिटरिंग समिति की 08.09.2020 दिनांकित रिपोर्ट के आधार पर, स्थायी समिति ने याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया और विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लिया। आरोप पत्र जारी किया गया, और बाद में JJB, पटना से वाद अभिलेखों के गायब होने के संबंध में प्राप्त आगे की रिपोर्ट के बाद अतिरिक्त आरोप बनाए गए।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय All India Judges Association v. Union of India; (2002) 4 SCC 247 के अनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने न्यायिक अधिकारियों की सेवा अभिलेखों की समय-समय पर समीक्षा करने हेतु एक समिति गठित कर रखी थी, जब वे 50, 55 और 58 वर्ष की आयु प्राप्त करते हैं, ताकि Bihar Service Code, 1952 के Rule 74(b)(ii) के तहत संभावित अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर विचार किया जा सके।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली इस समिति ने एक समूह के अधिकारियों की ACR, पिछले दस वर्षों की निपटान संख्या, सतर्कता शिकायतें, विभागीय जांच, प्रशासनिक शिकायतें और संपूर्ण सेवा अभिलेख पर विचार किया। इसने 16 न्यायिक अधिकारियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, को सेवा जारी रखने हेतु अनुपयुक्त मानते हुए उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति की अनुशंसा की।
फुल कोर्ट ने 08.02.2022 को इन अनुशंसाओं पर विचार किया। एक अधिकारी के संबंध में यह निर्णय लिया गया कि उसे अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के बजाय निलंबन और अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रहेगी। एक अन्य अधिकारी, जिसकी सामान्य सेवानिवृत्ति तीन महीने के भीतर होने वाली थी, के संबंध में यह कहकर उसे अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने से इंकार कर दिया गया कि उसे तीन माह की नोटिस वेतन नहीं दी जा सकती। शेष 14 अधिकारियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, के लिए फुल कोर्ट ने “अयोग्य अधिकारियों को हटाने (weeding out deadwood)” के उपाय के रूप में अनिवार्य सेवानिवृत्ति को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद सरकार ने Rule 74(b)(ii) के तहत एक आदेश जारी कर 14 नामित व्यक्तियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया। उसका निलंबन और प्रचलित विभागीय कार्यवाही स्थगित रखी गई। आहत होकर, उसने अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती देते हुए और पेंशन तथा वेतन से संबंधित दावों को उठाते हुए पटना उच्च न्यायालय में CWJC No. 5615 of 2022 दायर किया।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
माननीय मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चन्द्रन और माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रॉय की पीठ ने दो व्यापक पहलुओं की जांच की: क्या वास्तव में अनिवार्य सेवानिवृत्ति दुराचार के कारण दी गई सज़ा थी, और क्या Bihar Service Code के Rule 74 की विधिक आवश्यकताओं का पालन किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उसके विरुद्ध जांच ऐसे चरण में पहुँच चुकी थी जहाँ विभाग का साक्ष्य पूरा हो चुका था और मामला उसके बचाव साक्ष्य के चरण में था। अचानक उसका निलंबन और कार्यवाही स्थगित कर दी गई और उसे अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया। उनके अनुसार, एक बार आरोप तय होने और विभागीय कार्यवाही शुरू हो जाने के बाद, उसे तार्किक परिणति तक ले जाना अनिवार्य होता है और अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सहारा लेकर उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने पेंशन के लिए न्यूनतम अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी। अतः, बिना पेंशन के अनिवार्य सेवानिवृत्ति, उनके अनुसार, कलंककारी और दण्डात्मक थी, न कि एक तटस्थ प्रशासनिक कदम। उन्होंने यह भी इंगित किया कि थोड़े समय पहले ही याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त पाया गया था, जो कि, उनके अनुसार, बाद के इस आकलन से कि वह “deadwood” है, विरोधाभासी है।
याचिकाकर्ता ने आगे यह भी तर्क दिया कि Rule 74 के तहत निलंबन की स्थिति में कर्मचारी के लिए राज्य सरकार की विशिष्ट स्वीकृति आवश्यक है, और उसे पूर्ण तीन माह की नोटिस वेतन भी नहीं दी गई, क्योंकि निलंबन के दौरान उसे केवल 50% वेतन मिला था।
इन तर्कों के समर्थन में M.S. Bindra v. Union of India, Captain Pramod Kumar Bajaj v. Union of India, Abhay Jain v. High Court of Judicature for Rajasthan और Gujarat Steel Tubes Ltd. v. Gujarat Steel Tubes Mazdoor Sabha जैसे निर्णयों का हवाला दिया गया, मुख्यतः यह दिखाने के लिए कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति को छुपे रूप में दंड के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और पूर्व पदोन्नति या अच्छे ACR ऐसे कठोर कदम के विरुद्ध महत्वपूर्ण कारक होने चाहिए।
दूसरी ओर, उच्च न्यायालय की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जहाँ प्रतिकूल प्रविष्टियाँ निरस्त कर दी गई हों या शिकायतें बंद कर दी गई हों, वहाँ भी उस सामग्री को न्यायिक अधिकारी की उपयुक्तता के आकलन के लिए देखा जा सकता है। अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए किसी कलंक की आवश्यकता नहीं होती और न ही पूर्ण पैमाने की जांच जरूरी होती है। न्यायालय का ध्यान State of U.P. v. Bihari Lal, Arun Kumar Gupta v. State of Jharkhand, Pyare Mohan Lal v. State of Jharkhand, Allahabad Bank Officers’ Association v. Allahabad Bank, State of Gujarat v. Umedbhai M. Patel और अन्य निर्णयों की ओर दिलाया गया।
इन प्राधिकारों के आधार पर उच्च न्यायालय की ओर से यह तर्क दिया गया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 310 के अंतर्गत “doctrine of pleasure” का हिस्सा है, जिसका उपयोग लोकहित में “deadwood” तथा संदिग्ध ईमानदारी वाले अधिकारियों को हटाने के लिए किया जाता है। याचिकाकर्ता, जो संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाला न्यायिक अधिकारी था, ऐसा ही एक मामला बताया गया। फुल कोर्ट या स्थायी समिति के विरुद्ध किसी प्रकार की दुर्भावना (mala fides) का आरोप नहीं था।
पीठ ने पहले अनिवार्य सेवानिवृत्ति के संबंध में विधिक स्थिति का विश्लेषण किया। उसने यह नोट किया कि, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में कहा गया है, अनिवार्य सेवानिवृत्ति:
- सामान्यतः संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत दंड नहीं मानी जाती।
- लोकहित में उन अधिकारियों को हटाने के लिए दी जा सकती है जिनकी निरंतर सेवा उपयोगी नहीं है।
- पूरे सेवा अभिलेख, जिसमें ACR, शिकायतें, जांचें और निपटान शामिल हैं, के आधार पर होनी चाहिए।
- ऐसे मामलों में जहाँ विभागीय जांच उपयुक्त हो, केवल जांच से बचने के लिए इसे शॉर्टकट के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए।
- न्यायालय केवल यह परीक्षण कर सकते हैं कि कोई वैध सामग्री थी या नहीं, और क्या कार्यवाही bona fide थी और किसी बाह्य या अप्रामाणिक कारण पर आधारित नहीं थी।
न्यायालय ने Gujarat Steel Tubes Ltd. v. Mazdoor Sabha से उद्धरण देते हुए यह भी समझाया कि दुराचार के निष्कर्ष पर आधारित दण्डात्मक बर्खास्तगी और termination simpliciter के बीच क्या अंतर है, जहाँ नियोक्ता, संदेह के बावजूद, किसी कर्मचारी को, जिसके साथ वह संतुष्ट नहीं है, बिना दोषसिद्धि दर्ज किए या उस पर भरोसा किए, केवल उसे न रखना चुनता है।
इस विधि को लागू करते हुए, पीठ ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के वास्तविक आदेश Annexure-7 की जांच की। उसमें मात्र Rule 74(b)(ii) का हवाला देते हुए 14 अधिकारियों की सूची दी गई थी जिन्हें लोकहित में सेवानिवृत्त किया गया। उसमें याचिकाकर्ता के चरित्र या आचरण पर कोई टिप्पणी नहीं थी। Allahabad Bank Officers’ Association के निर्णय का अनुसरण करते हुए न्यायालय ने माना कि केवल नियम का उल्लेख, भले ही उसमें “लोकहित” जैसे आधारों की बात हो, से आदेश दण्डात्मक या कलंककारी नहीं हो जाता।
इसके बाद, पीठ ने याचिकाकर्ता के सेवा अभिलेख और उच्च न्यायालय की समिति द्वारा विचारित सामग्री की समीक्षा की।
उसकी 24.10.2019 दिनांकित ACR में उसे “औसत” (Average) ग्रेड दिया गया। अगली ACR दिनांक 12.09.2020 में उसे “अच्छा” (Good) ग्रेड दिया गया, लेकिन उसके कार्य की गुणवत्ता और विधि के ज्ञान को “औसत” बताया गया। उसकी लगन, शीघ्र निपटान और उच्च दायित्व ग्रहण करने की तत्परता को “कुछ हद तक” ही दर्ज किया गया। दोनों ACR में उसके विरुद्ध कई आरोपों के लंबित होने का उल्लेख था।
मॉनिटरिंग समिति की 08.09.2020 की कार्यवाही का विवरण विस्तार से पुनरुत्पादित किया गया। उसमें उसके विरुद्ध प्रधान न्यायिक मजिस्ट्रेट, JJB, पटना के रूप में बार-बार शिकायतें दर्ज होने का उल्लेख था, जैसे कि विधिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करना, मनमाने आदेश पारित करना, कथित रूप से निहित स्वार्थ के साथ, तथा “above board” न रहना। समिति ने उसके व्यवहार के बारे में सामाजिक सदस्यों से बार-बार शिकायतें, उसके और सामाजिक सदस्यों के बीच गंभीर दरार, जिससे JJB का काम प्रभावित हुआ, 17.11.2019 को जारी विशेष निर्देशों का अनुपालन न करना, और Observation Home में गंभीर समस्याएँ, जिनमें एक घटना भी शामिल थी जहाँ एक किशोर को अन्य बालकों द्वारा निर्ममता से पीटा गया, को दर्ज किया।
इस सामग्री के आधार पर, मॉनिटरिंग समिति ने अनुशंसा की कि उसे JJB से “तत्काल राहत” दी जाए और उसकी जगह उपयुक्त अधिकारी की नियुक्ति की जाए। यही निष्कर्ष स्थायी समिति द्वारा उसे निलंबित करने और विभागीय कार्यवाही शुरू करने का कारण बने।
प्रतिवाद हलफनामा में उसके विरुद्ध लगभग 12 अलग-अलग आरोप-पत्रिकाओं की सूची दी गई। इनमें से कई शीर्षक वादों में पारित न्यायिक आदेशों, कथित रिश्वत या पक्षपात, धमकी, अपमानजनक व्यवहार या अवैध गतिविधियों से संबंधित थीं। यद्यपि अधिकांश को इस आधार पर फाइलों में समाहित या बंद कर दिया गया कि न्यायिक आदेशों के विरुद्ध अपील नहीं की गई थी या समर्थक हलफनामा नहीं था, न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि ऐसी शिकायतों की संख्या और उसके अध्यक्ष अधिकारी के रूप में आचरण के बारे में बार-बार संदर्भ, भले ही वे औपचारिक अनुशासनात्मक कार्यवाही में परिणत न हुए हों, उसकी उपयुक्तता के आकलन के लिए प्रासंगिक हैं।
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि एक आरोप के परिणामस्वरूप उसे Principal Magistrate, JJB, पटना के रूप में उसके आचरण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा चेतावनी दी गई थी।
उसके हालिया पदोन्नति संबंधी तर्क पर, पीठ ने Pyare Mohan Lal और Arun Kumar Gupta का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों के मामले में “washed-off” सिद्धांत लागू नहीं होता। पदोन्नति के बाद भी समूचा सेवा अभिलेख, जिसमें पूर्व की प्रतिकूल सामग्री भी शामिल है, सेवा में बने रहने की उपयुक्तता या लोकहित में अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आकलन करते समय प्रासंगिक रहता है।
पीठ ने इंगित किया कि JJB में उसके आचरण से संबंधित शिकायतें मुख्यतः पदोन्नति और वहाँ पदस्थापन के बाद उत्पन्न हुईं। 12.09.2020 की ACR और मॉनिटरिंग समिति की 08.09.2020 की रिपोर्ट, दोनों ही उसके Principal Magistrate, JJB, पटना बनाए जाने के बाद की हैं, अतः उन्हें पूर्व पदोन्नति के आधार पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
Rule 74 के उपबंध (proviso) से संबंधित तर्क पर, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निलंबित कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के लिए राज्य सरकार की विशिष्ट स्वीकृति की माँग करने वाला उपबंध केवल उस स्थिति में लागू होता है जहाँ कर्मचारी स्वयं Rule 74(b)(i) के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का अनुरोध करता है। यह उस स्थिति में लागू नहीं होता जहाँ सरकार या, उच्च न्यायालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मामले में, मुख्य न्यायाधीश, Rule 74(b)(ii) के तहत लोकहित में अनुपयुक्तता के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश देते हैं।
यहाँ याचिकाकर्ता ने स्वयं सेवानिवृत्ति का अनुरोध नहीं किया था; उसे उच्च न्यायालय के आकलन के आधार पर अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया गया। अतः उस उपबंध के तहत राज्य सरकार की विशिष्ट स्वीकृति पर जोर देना अनुचित था।
इसके बाद न्यायालय ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के परिणामों पर विचार किया। न्यायालय ने माना कि ऐसा आदेश पिछली सेवा को समाप्त नहीं करता और सिद्धांततः यदि कर्मचारी ने न्यूनतम पेंशन योग्य सेवा पूरी कर ली हो, तो वह पेंशन और ग्रेच्युटी का हकदार रहता है। इस मामले में, याचिकाकर्ता ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के समय वह न्यूनतम अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी। अतः उसे पेंशन न मिलना, उसकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के कारण नहीं, बल्कि सेवा की आवश्यक अवधि के अभाव के कारण था।
पीठ ने यह तर्क अस्वीकार कर दिया कि जिसके पास अभी पेंशन योग्य सेवा नहीं है, उसे Rule 74 के तहत, भले ही वह सेवा जारी रखने के लिए अनुपयुक्त पाया जाए, अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त नहीं किया जा सकता।
हालाँकि, वेतन के मुद्दे पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता की शिकायत में दम पाया। चूँकि उसका निलंबन स्थगित रखा गया और उसे Rule 74(b)(ii) के तहत अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया गया, वह तीन माह की नोटिस वेतन एवं भत्ते पाने का हकदार था। यदि उस अवधि के दौरान उसे केवल 50% निर्वाह भत्ता ही दिया गया, तो उसे तीन माह की नोटिस अवधि के लिए शेष वेतन और भत्तों का भुगतान किया जाना था।
आगे, चूँकि उच्च न्यायालय ने विभागीय जांच को बंद कर दिया और अनिवार्य सेवानिवृत्ति को गैर-दण्डात्मक माना, पीठ ने यह घोषित किया कि याचिकाकर्ता पूरे निलंबन काल के लिए पूर्ण वेतन पाने का हकदार है। कोई निर्वाह भत्ता पहले से दिया गया हो तो उसे समायोजित किया जाएगा और शेष वेतन जारी किया जाएगा।
अंततः, पटना उच्च न्यायालय ने Rule 74(b)(ii) के तहत लोकहित में प्रदत्त शक्ति के वैध प्रयोग के रूप में अनिवार्य सेवानिवृत्ति को बरकरार रखा। न्यायालय ने माना कि यह निर्णय समग्र सेवा अभिलेख और समिति तथा फुल कोर्ट के समक्ष उपलब्ध सामग्री के आधार पर लिया गया था, न कि किसी विशिष्ट दुराचार के लिए उसे दंडित करने की इच्छा से प्रेरित था। रिट याचिका खारिज कर दी गई, परन्तु निम्नलिख लिखित भुगतान के निर्देशों के साथ:
- पूरे निलंबन काल के लिए पूर्ण वेतन, जिसमें से पूर्व में दिए गए निर्वाह भत्ते को समायोजित किया जाएगा, तथा
- Rule 74(b)(ii) के तहत तीन माह की नोटिस अवधि के स्थान पर पूर्ण वेतन और भत्ते।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार और उससे बाहर के न्यायिक अधिकारियों एवं सरकारी सेवकों के लिए महत्वपूर्ण है। यह पुष्टि करता है कि पटना उच्च न्यायालय Rule 74(b)(ii) के तहत, लोकहित में, न्यायिक अधिकारियों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर सकता है, भले ही अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित हो, बशर्ते कि सेवानिवृत्ति केवल जांच से बचने हेतु न हो और समग्र सेवा अभिलेख पर आधारित हो।
निर्णय यह स्पष्ट करता है कि पेंशन हेतु अर्हकारी सेवा की कमी अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बाधा नहीं है। जब अलगाव गैर-दण्डात्मक अनिवार्य सेवानिवृत्ति के माध्यम से हो, तो पेंशन का अधिकार सेवा की अवधि पर निर्भर करता है, न कि अलगाव की प्रकृति पर।
साथ ही, न्यायालय ने अधिकारी के वित्तीय अधिकारों की रक्षा करते हुए निलंबन अवधि के दौरान पूर्ण वेतन और पूर्ण नोटिस वेतन के भुगतान का निर्देश दिया। यह संकेत देता है कि जहाँ एक ओर प्रणाली ऐसे अधिकारियों को हटा देगी जिन्हें अनुपयुक्त माना जाता है, वहीं दूसरी ओर वह वैधानिक मौद्रिक अधिकारों को भी लागू करेगी।
विवादकारियों और अधिवक्ताओं के लिए, यह मामला दिखाता है कि अनेक शिकायतें, भले ही प्रत्येक को अलग-अलग रूप से अनुशासनात्मक कार्यवाही के बिना बंद कर दिया गया हो, फिर भी यह प्रभावित कर सकती हैं कि न्यायालय किसी न्यायिक अधिकारी के सेवा में बने रहने पर क्या दृष्टिकोण रखे। न्यायिक अधिकारियों के लिए, यह विशेष रूप से संवेदनशील पदों, जैसे Juvenile Justice Boards, पर तैनाती के दौरान निःकलंक और निरंतर आदर्श आचरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
विधिक प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या Bihar Service Code के Rule 74(b)(ii) के तहत याचिकाकर्ता की अनिवार्य सेवानिवृत्ति, लंबित अनुशासनात्मक जांच को निष्कर्षित करने से बचने हेतु पारित दण्डात्मक, कलंककारी आदेश थी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि यह लोकहित में समग्र सेवा अभिलेख के आधार पर दिया गया गैर-दण्डात्मक, गैर-कलंककारी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश था, जो छुपा हुआ दंड नहीं था, और इस प्रकार अनुच्छेद 311(2) आकर्षित नहीं होता। - प्रश्न: क्या Rule 74(b)(i) के उपबंध, जो निलंबित कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के लिए राज्य सरकार की विशिष्ट स्वीकृति की माँग करता है, का इस मामले में अनुप्रयोग होता था?
उत्तर: नहीं। यह उपबंध केवल तब लागू होता है जब कर्मचारी स्वयं अनिवार्य/स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगता है; यह उस अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर लागू नहीं होता जो नियोक्ता द्वारा Rule 74(b)(ii) के तहत अनुपयुक्तता के आधार पर की जाती है। - प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता, अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बावजूद, निलंबन और नोटिस अवधि के लिए मौद्रिक लाभ पाने का हकदार था?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने निर्देश दिया कि पूरे निलंबन काल के लिए पूर्ण वेतन तथा Rule 74(b)(ii) के तहत तीन माह की नोटिस अवधि के स्थान पर पूर्ण वेतन और भत्ते, पूर्व में दिए गए किसी भी निर्वाह भत्ते को समायोजित करते हुए, का भुगतान किया जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- M.S. Bindra v. Union of India & Others; (1998) 7 SCC 310
- Captain Pramod Kumar Bajaj v. Union of India and Another; 2023 SCC OnLine SC 234
- Abhay Jain v. High Court of Judicature for Rajasthan and Another; (2022) 13 SCC 1
- Gujarat Steel Tubes Ltd. and Others v. Gujarat Steel Tubes Mazdoor Sabha and Others; (1980) 2 SCC 593
- State of U.P. and Another v. Bihari Lal; 1994 Supp (3) SCC 593
- Arun Kumar Gupta v. State of Jharkhand and Another; (2020) 13 SCC 355
- Pyare Mohan Lal v. State of Jharkhand and Others; (2010) 10 SCC 693
- Allahabad Bank Officers’ Association v. Allahabad Bank; (1996) 4 SCC 504
- Shyam Lal v. State of U.P.; (1955) 1 SCR 26
- State of Bombay v. Saubhagchand M. Doshi; 1958 2 SCR 57
- Swami Saran Saxena v. State of U.P.; (1980) 1 SCC 12
- Ram Ekbal Sharma v. State of Bihar; (1990) 3 SCC 504
- Nand Kumar Verma v. State of Jharkhand; (2012) 3 SCC 580
- Nisha Priya Bhatia v. Union of India; (2020) 13 SCC 56
- State of Gujarat v. Umedbhai M. Patel; (2001) 3 SCC 314
- All India Judges Association v. Union of India; (2002) 4 SCC 247
- T.S. Naqshbandi v. State of J&K; (2003) 9 SCC 592
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 5615 of 2022
मामले का शीर्षक: Sanjiv Kumar Chandhariyavi v. The High Court of Judicature at Patna & Others
उद्धरण: 2024 (2) PLJR 133
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble the Chief Justice K. Vinod Chandran; Hon’ble Mr. Justice Rajiv Roy
निर्णय की तिथि: 18-01-2024
मामले का स्वरूप: न्यायिक अधिकारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Jitendra Kumar Singh, Senior Advocate; Mr. Anjani Kumar Sinha, Advocate; Mr. Harsh Singh, Advocate
- राज्य/प्रतिवादी की ओर से: Mr. Manish Kumar, GP-4; Mr. Manoj Kumar, AC to GP-4
- उच्च न्यायालय की ओर से: Mr. Piyush Lall, Advocate
विचारित वैधानिक प्रावधान: Bihar Service Code, 1952 के Rule 74(b)(ii) तथा Rule 74(b)(i) के उपबंध
निर्णय का लिंक: Patna High Court की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें
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