प्रमोशन अंकों के नियम का गलत पठन, रिट स्वीकार — पटना उच्च न्यायालय, 2024

इस मामले में, बिहार के एक विश्वविद्यालय के एक वर्ग‑IV कर्मचारी ने स्वयं को वर्ग‑III पद पर पदोन्नति न दिए जाने को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि विश्वविद्यालय ने विभागीय परीक्षा में प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45 अंक अनिवार्य मानकर गलती की। न्यायालय ने निर्णय दिया कि नियम केवल कुल अंकों में 45% की आवश्यकता रखता है। विश्वविद्यालय को तीन माह के भीतर उसकी पदोन्नति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता की नियुक्ति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में वर्ग‑IV कर्मचारी के रूप में 28.07.1990 को अनुकंपा के आधार पर की गई थी। यह नियुक्ति पूर्व कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार की सहायता के लिए की गई थी, जैसा कि अनुकंपा नियुक्तियों में किया जाता है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इस प्रारंभिक नियुक्ति के बाद उसे कभी भी वर्ग‑III पद पर पदोन्नति नहीं दी गई। उसने कहा कि उसे एक बार 08.02.1997 को वर्ग‑III पद पर पदोन्नत किया गया था, परंतु यह पदोन्नति आदेश 27.02.1997 को वापस ले लिया गया। यह वापसी बिना किसी नोटिस के की गई।

बाद में, 2005 में, इसी प्रकार की स्थिति वाले कुछ वर्ग‑IV कर्मचारियों को रूटीन क्लर्क के पद पर पदोन्नत किया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे उस प्रक्रिया में भी बाहर रखा गया, जबकि वे सब एक ही वर्ग‑IV श्रेणी के कर्मचारी थे।

2015 में, विश्वविद्यालय ने विभागीय पदोन्नति परीक्षा के माध्यम से वर्ग‑III पदों पर पदोन्नति के लिए प्रक्रिया आरंभ की। याचिकाकर्ता ने इस परीक्षा में भाग लिया। लेकिन उसे फिर भी पदोन्नति से वंचित कर दिया गया।

इसलिए याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की नागरिक रिट क्षेत्राधिकार की शरण ली, और पदोन्नति से इंकार तथा विश्वविद्यालय और उसकी पदोन्नति समिति द्वारा पदोन्नति नियमों की व्याख्या करने के तरीके को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद विश्वविद्यालय के पदोन्नति नियमों, विशेष रूप से विभागीय पदोन्नति परीक्षा को नियंत्रित करने वाले नियम, के पठन‑पाठन को लेकर था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 2015 की परीक्षा में दो प्रश्नपत्र थे, प्रत्येक 100 अंकों का। याचिकाकर्ता ने प्रश्नपत्र‑I में 100 में से 42 अंक तथा प्रश्नपत्र‑II में 100 में से 55 अंक प्राप्त किए। इस प्रकार कुल 200 अंकों में से उसने 97 अंक प्राप्त किए, जो कि समग्र रूप से 48.5% है।

विश्वविद्यालय ने यह कहते हुए उसे पदोन्नति से वंचित कर दिया कि उसने प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45 अंक प्राप्त नहीं किए। पदोन्नति समिति के अनुसार, उत्तीर्णांक प्रत्येक प्रश्नपत्र में 100 में से 45 था, और चूंकि उसने एक प्रश्नपत्र में केवल 42 अंक प्राप्त किए, इसलिए उसे परीक्षा में अनुत्तीर्ण माना गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह प्रस्तुत किया कि यह व्याख्या गलत है। उन्होंने पदोन्नति विधान पर भरोसा किया और इंगित किया कि उसमें प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक प्राप्त करना आवश्यक नहीं बताया गया है, बल्कि केवल परीक्षा के कुल अंकों में 45% प्राप्त करना अनिवार्य है।

इसे समर्थन देने के लिए, उन्होंने पटना उच्च न्यायालय की समान पीठ के निर्णय C.W.J.C. No. 6981 of 2020 (Prem Chandra Prasad v. Lalit Narayan Mithila University) का हवाला दिया। उस मामले में भी पदोन्नति नियमों के इसी प्रावधान की न्यायालय द्वारा व्याख्या की गई थी।

दूसरी ओर, विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि पदोन्नति नियम लागू होने के बाद एक पदोन्नति समिति गठित की गई। इस समिति ने 30.11.2015 को एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया कि 100 में से 45 अंक उत्तीर्णांक है। इस प्रस्ताव के आधार पर समिति ने यह आग्रह किया कि प्रत्येक अभ्यर्थी को हर प्रश्नपत्र में कम से कम 45 अंक प्राप्त करना अनिवार्य है।

चूंकि याचिकाकर्ता ने प्रश्नपत्र‑I में 45 अंक प्राप्त नहीं किए, इसलिए उसे अर्ह नहीं माना गया और इस प्रकार उसे पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि Prem Chandra Prasad के मामले में दिए गए पूर्व निर्णय में पदोन्नति समिति के इस विशेष प्रस्ताव पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए वह निर्णय वर्तमान मामले पर प्रभावी नहीं होना चाहिए।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने अभिलेख पर उपलब्ध सामग्रियों, जिनमें पदोन्नति नियम भी शामिल हैं, की जांच की। प्रासंगिक प्रावधान नियुक्ति या पदोन्नति से संबंधित नियम 8 के उप‑नियम 6 के कॉलम (v) में निहित है। निर्णय में उद्धृत नियम के हिंदी पाठ से स्पष्ट होता है कि विभागीय पदोन्नति परीक्षा वर्ष में दो बार होगी और उसमें दो प्रश्नपत्र होंगे। प्रत्येक प्रश्नपत्र 100 अंकों का होगा। विभागीय परीक्षा में सफलता के लिए यह कहा गया है कि न्यूनतम 45% अंक प्राप्त करना अनिवार्य है।

इस प्रावधान का विश्लेषण करने के बाद न्यायालय ने माना कि विभागीय पदोन्नति परीक्षा दो प्रश्नपत्रों की होती है, प्रत्येक 100 अंकों का, और कर्मचारी को उत्तीर्ण घोषित होने के लिए कुल अंकों में से 45% प्राप्त करने होते हैं। इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि प्रत्येक प्रश्नपत्र में अलग‑अलग 45% अंक प्राप्त करना आवश्यक है।

न्यायालय ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में समग्र रूप से 48.5% अंक प्राप्त किए हैं, जो आवश्यक 45% से अधिक है। इसलिए, नियम के सरल पठन से ही वह परीक्षा उत्तीर्ण हो जाता है। नियम अपने शब्दों में न्यूनतम 45% अंक प्रत्येक प्रश्नपत्र में अलग‑अलग पाने की शर्त नहीं रखता।

न्यायालय ने फिर Prem Chandra Prasad के पूर्व निर्णय पर विचार किया। उस मामले में भी इसी पदोन्नति नियम की जांच की गई थी। समान पीठ ने यह माना था कि नियम केवल इतना ही निर्धारित करता है कि विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 45% अंक आवश्यक हैं। इसमें यह अपेक्षा नहीं की गई है कि इतने अंक प्रत्येक प्रश्नपत्र में अलग‑अलग प्राप्त करना अनिवार्य है।

समान पीठ ने यह भी अवलोकन किया था कि नियम को भिन्न ढंग से पढ़ने से अभ्यर्थियों को अनावश्यक कठिन स्थिति में डाल दिया जाएगा, विशेषकर तब, जब ऐसे मामलों में पदोन्नति का मूल सिद्धांत “ज्येष्ठता‑সহ‑योग्यता” है, न कि “योग्यता‑সহ‑ज्येष्ठता”। इसका अर्थ है कि ज्येष्ठता प्रमुख तत्व है और योग्यता को केवल आवश्यक सीमा तक देखा जाता है, न कि एकमात्र निर्णायक कारक के रूप में।

न्यायमूर्ति सिन्हा ने इस तर्क से सहमति व्यक्त की। उन्होंने उल्लेख किया कि किसी नियम की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि वह भ्रम न उत्पन्न करे या ज्येष्ठता‑সহ‑योग्यता वाली पदोन्नति योजना में अन्याय न करे। नियम में कहीं भी यह विशिष्ट आवश्यकता नहीं है कि प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक प्राप्त किए जाएं। नियम सही शब्दों में है और साफ‑साफ कुल अंकों की बात करता है।

न्यायालय ने आगे यह भी अवलोकन किया कि प्रत्येक प्रश्नपत्र के लिए अलग से कोई न्यूनतम उत्तीर्णांक निर्धारित नहीं है। अतः सीमा को बढ़ाकर प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45 अंक पर जोर देना, वर्ग‑III पद के लिए स्वयं नियम में निर्धारित आवश्यकता से अधिक मांगने के समान है।

इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि पदोन्नति समिति द्वारा अपनाई गई व्याख्या वैध नहीं है। प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक अनिवार्य मानना पदोन्नति नियमों से परे जाकर की गई मांग है, जिसे समर्थन नहीं दिया जा सकता।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि नियम के साधारण पठन से ही यह स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक प्राप्त करने की शर्त अस्तित्व में ही नहीं है। पदोन्नति समिति का प्रस्ताव वैधानिक नियम को न तो निरस्त कर सकता है और न ही उसमें संशोधन कर सकता है। याचिकाकर्ता ने समग्र रूप से 48.5% अंक प्राप्त कर लिए हैं, इसलिए उसने नियम की आवश्यकता को पूर्ण किया और वह पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकारी है।

अंततः पटना उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय और पदोन्नति समिति को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के मामले में पदोन्नति पर पुनर्विचार करें। उन्हें यह कार्य आदेश की प्रति प्राप्त होने या दिखाए जाने की तिथि से तीन माह के भीतर करना होगा।

पुनर्विचार करते समय उन्हें 2015 की परीक्षा में याचिकाकर्ता द्वारा प्राप्त अंकों को ध्यान में रखना होगा और विशेष रूप से यह मनाही होगी कि वे इस आधार पर याचिकाकर्ता को अस्वीकार करें कि उसने प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक प्राप्त नहीं किए।

इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विश्वविद्यालयों और समान संस्थानों में कार्यरत वर्ग‑IV तथा अन्य निम्न श्रेणी के उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो विभागीय परीक्षाओं के माध्यम से पदोन्नति चाहते हैं।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि प्राधिकार लिखित पदोन्नति नियमों से आगे नहीं जा सकते। यदि नियम केवल कुल अंकों का एक निश्चित प्रतिशत मांगता है, तो अधिकारी आंतरिक प्रस्ताव पास करके प्रत्येक प्रश्नपत्र में न्यूनतम अंक जैसी अतिरिक्त शर्तें नहीं जोड़ सकते।

यह निर्णय ज्येष्ठता‑সহ‑योग्यता प्रणाली की भी रक्षा करता है। जो कर्मचारी वरिष्ठ हैं और परीक्षा में मूल पात्रता अंक प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें कठोर, लिखित नियमों से परे बनाए गए मानकों के कारण बाहर नहीं किया जाना चाहिए। यह विशेष रूप से अनुकंपा पर नियुक्त तथा लंबे समय से सेवा दे रहे उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो वित्तीय और कैरियर प्रगति के लिए पदोन्नति पर निर्भर हैं।

जिन कर्मचारियों की पदोन्नति इसी प्रकार के आधार पर रोकी गई है, उनके लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि यदि ऐसी अस्वीकृतियां नियमों के वास्तविक शब्दों से मेल न खाने वाली व्याख्या पर आधारित हैं, तो उन्हें चुनौती दी जा सकती है।

कानूनी मुद्दे और उत्तर

  • मुद्दा: क्या विश्वविद्यालय के पदोन्नति नियमों के तहत कर्मचारी को विभागीय पदोन्नति परीक्षा के प्रत्येक प्रश्नपत्र में कम से कम 45% अंक प्राप्त करने होंगे, या केवल समग्र रूप से 45% अंक पर्याप्त हैं?
    उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने माना कि नियम केवल परीक्षा के कुल अंकों में से 45% अंक की मांग करता है, न कि प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% की, और पदोन्नति समिति की विपरीत व्याख्या अवैध है।
  • मुद्दा: क्या विश्वविद्यालय और पदोन्नति समिति नियम की अपनी व्याख्या के आधार पर याचिकाकर्ता को पदोन्नति से वंचित करने में न्यायोचित थे?
    उत्तर: न्यायालय ने माना कि वे न्यायोचित नहीं थे और उन्हें निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता की पदोन्नति पर उसके समग्र अंकों के आधार पर पुनर्विचार करें, बिना प्रत्येक प्रश्नपत्र में 45% अंक की शर्त पर जोर दिए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • C.W.J.C. No. 6981 of 2020, Prem Chandra Prasad v. Lalit Narayan Mithila University (पटना उच्च न्यायालय की समान पीठ, जिसमें विभागीय परीक्षा में 45% अंकों से संबंधित इसी पदोन्नति नियम की व्याख्या की गई)।

मामले का विवरण

केस नंबर: Civil Writ Jurisdiction Case No. 17715 of 2015

केस शीर्षक: Birendra Kumar Singh v. The Lalit Narayan Mithila University & Ors.

उद्धरण: 2024 (2) PLJR 457

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Anil Kumar Sinha

निर्णय की तिथि: 15.04.2024

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Suman Kumar Singh, Advocate
  • प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Ajay Behari Sinha, Advocate
  • विश्वविद्यालय की ओर से: Mr. Iqbal Asif Niazi, Advocate

मामले की प्रकृति: पदोन्नति नियमों तथा विभागीय परीक्षा के अंकों की व्याख्या के आधार पर वर्ग‑III पद पर पदोन्नति से इंकार को चुनौती देते हुए दायर नागरिक रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment: CWJC No. 17715 of 2015

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