मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 2007 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (एमजीएनआरईजीए) के अंतर्गत कार्यक्रम पदाधिकारी के रूप में की गई थी। समय-समय पर उन्होंने बिहार के विभिन्न जिलों में कार्य किया।
आदेश दिनांक 18.12.2020 द्वारा उन्हें स्थानांतरित कर दानापुर प्रखंड, पटना में कार्यक्रम पदाधिकारी के रूप में पदस्थापित किया गया। उन्होंने 19.12.2020 को वहाँ कार्यभार ग्रहण किया।
दानापुर में कार्य करते हुए, उनका कहना है कि ग्राम पंचायत गङ्घारा के पंचायत रोजगार सेवक द्वारा दायित्वों का ठीक से निर्वहन नहीं किया जा रहा था। उनके अनुसार, उन्होंने और उनकी पूर्ववर्ती, दोनों ने इस संबंध में उच्च अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे। कुछ वन पोषकों (रोपण योजनाओं के लिए नियोजित श्रमिक) ने भी उप विकास आयुक्त (प्रतिवादी संख्या 3) के समक्ष पंचायत रोजगार सेवक द्वारा उनकी मजदूरी का भुगतान न होने की शिकायत की।
इसी पृष्ठभूमि में, प्रतिवादी संख्या 3 ने 02.09.2021 को याचिकाकर्ता एवं अन्य के विरुद्ध वन पोषकों को भुगतान न होने के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता ने 24.09.2021 को उत्तर दिया कि संबंधित सभी रोपण योजनाएँ जुलाई 2020 में प्रारंभ हुई थीं, जो कि उनके दिसंबर 2020 में जॉइन करने से काफी पहले की बात है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उत्तरदायित्व तत्कालीन कार्यक्रम पदाधिकारी तथा पंचायत रोजगार सेवक पर था। उन्होंने यह भी कहा कि जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने पंचायत रोजगार सेवक को भौतिक निरीक्षण कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया, ताकि भुगतान किया जा सके। बाद में भुगतान जारी कर दिया गया और वन पोषकों ने 22.10.2021 के आवेदन द्वारा अपनी शिकायत वापस ले ली।
बाद में, दानापुर प्रखंड अंतर्गत गङ्घारा ग्राम पंचायत की रोपण योजनाओं के संबंध में प्राप्त शिकायतों पर कार्यवाही करते हुए, जिला स्तरीय निरीक्षण टीम ने 01.12.2021 को एमजीएनआरईजीए के अंतर्गत 17 रोपण योजनाओं का संयुक्त निरीक्षण किया। टीम में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, डीआरडीए, पटना तथा कार्यपालक अभियंता, एमजीएनआरईजीए, पटना शामिल थे और उन्होंने कार्यक्रम पदाधिकारी, दानापुर, पंचायत रोजगार सेवक, लाभुकों एवं ग्रामीणों की उपस्थिति में योजनाओं का निरीक्षण किया।
23.12.2021 की जांच प्रतिवेदन में इन 17 रोपण योजनाओं के क्रियान्वयन में कई अनियमितताएँ पाई गईं।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के आधार पर 02.02.2022 को सभी संबंधित व्यक्तियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थीं, को विस्तृत कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस में दस विशिष्ट बिंदुओं पर स्पष्टीकरण माँगा गया।
याचिकाकर्ता ने 21.03.2022 को अपना उत्तर दाखिल किया। उन्होंने पंचायत रोजगार सेवक के 14.03.2022 के पत्र पर भी भरोसा किया, जिसमें 17 योजनाओं के अभिलेखों में त्रुटियों का उल्लेख था, यह समझाया गया था कि कुछ पौधे बाढ़ और जलजमाव से नष्ट हो गए थे और यह दावा किया गया था कि पुनः रोपण किया गया तथा वन पोषकों को भुगतान किया जाएगा।
विषय पर विचार करने के बाद, जिला पदाधिकारी, पटना (प्रतिवादी संख्या 2) ने 01.07.2022 का आदेश पारित किया। इस आदेश द्वारा याचिकाकर्ता का एमजीएनआरईजीए कार्यक्रम पदाधिकारी के रूप में अनुबंध निरस्त कर दिया गया और उनसे 3,92,800/- रुपये की वसूली का आदेश दिया गया। आदेश में रोपण योजनाओं में अनियमितताओं के संबंध में छह मुख्य निष्कर्ष दर्ज किए गए, जिनमें मस्टर रोल जारी न होना, समुचित अभिलेख और फोटोग्राफ का अभाव, निर्धारित दर से अधिक भुगतान, वन पोषकों की नियुक्ति नहीं होना तथा अन्य प्रक्रियागत त्रुटियाँ शामिल थीं।
याचिकाकर्ता ने उच्च प्राधिकारी (प्रतिवादी संख्या 1) के समक्ष अपील दायर की। उनका तर्क था कि 01.07.2022 का आदेश बिना उन्हें उचित सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया और, इससे भी महत्वपूर्ण यह कि दंडादेश छह आधारों पर टिका था जो मूल कारण बताओ नोटिस दिनांक 02.02.2022 में बताए गए दस बिंदुओं से भिन्न थे। उनके अनुसार, उन्हें उन मामलों पर दंडित किया गया जिनका उल्लेख कारण बताओ नोटिस में कभी किया ही नहीं गया था।
अपीलीय प्राधिकारी ने 21.10.2022 के आदेश द्वारा यह माना कि मामले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और इसे जिला पदाधिकारी, पटना को पुनः विचार हेतु वापस भेज दिया। जिला पदाधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देकर पुनर्विचार करें।
रिमांड पर, जिला पदाधिकारी ने पुनः याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत रूप से सुनवाई की। तत्पश्चात, उन्होंने 01.12.2022 को नया आदेश पारित किया। यही आदेश पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की केन्द्रीय कड़ी है और इसे फैसले में विस्तार से उद्धृत किया गया।
01.12.2022 के आदेश में जिला पदाधिकारी ने गङ्घारा ग्राम पंचायत की 17 रोपण योजनाओं में गंभीर वित्तीय एवं प्रक्रियागत अनियमितताओं के पूर्ववर्ती निष्कर्षों की पुनः पुष्टि की। निष्कर्षों में निम्न बातें शामिल थीं:
- इन 17 योजनाओं में 16,64,750/- रुपये का व्यय बिना पूर्ण सहायक अभिलेखों के।
- अभिलेखों में योजनाओं के नाम का उल्लेख नहीं और भूमि विवरण/सहमति पत्रों का अभाव।
- जहाँ पंचायत रोजगार सेवक के हस्ताक्षर होने चाहिए थे, वहाँ पंचायत तकनीकी सहायक के हस्ताक्षर पाए गए, वह भी बिना तिथि के।
- रोपण कार्य के लिए मस्टर रोल जारी नहीं किया गया।
- 17 में से 16 योजनाओं का नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शन नहीं और कार्यस्थल के फोटोग्राफ का अभाव।
- निजी भूमि पर प्रति रोपण योजना 4,500/- रुपये का भुगतान, जबकि निर्धारित दर 2,900/- रुपये थी; इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता माना गया, जिसे संबंधित कार्यक्रम पदाधिकारी एवं पंचायत तकनीकी सहायक द्वारा स्वीकार किया गया।
- केवल चार योजनाओं में तारबंदी की गई, जबकि नौ योजनाओं के लिए भुगतान जारी कर दिया गया।
- मापन पुस्तिका में तारबंदी एवं कीटनाशक कार्य का विस्तृत अभिलेख नहीं, जबकि राशि निकासी दिखी।
इसके अतिरिक्त, 01.12.2022 के आदेश में याचिकाकर्ता की पूर्व सेवा अभिलेखों का भी संज्ञान लिया गया। इसमें जिला पदाधिकारी, बेगूसराय के 24.01.2014 के आदेश का उल्लेख था, जिसमें उनके विरुद्ध सरकारी धन की हेराफेरी, कर्तव्य में लापरवाही, असावधानी और अनुशासनहीनता के गंभीर आरोप लगाए गए थे। साथ ही, कार्यक्रम पदाधिकारी, बेगूसराय के 31.01.2021 के पत्र का भी उल्लेख किया गया, जिसमें पूर्ववर्ती अनियमितताओं के संदर्भ में उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
इन पहलुओं पर विचार करने के बाद, जिला पदाधिकारी ने 01.07.2022 के पूर्व आदेश, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता का अनुबंध रद्द किया गया था और 3,92,800/- रुपये की वसूली का आदेश हुआ था, को यथावत रखा। वे एक कदम और आगे बढ़ते हुए, 01.12.2022 के विवादित आदेश में वर्तमान अनियमितताओं के संबंध में याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश भी दे दिया।
याचिकाकर्ता ने पुनः अपील की। इस बार उन्होंने 01.12.2022 के आदेश के साथ-साथ उससे उत्पन्न सभी परिणामी कार्यवाहियों को भी चुनौती दी। तथापि, अपीलीय प्राधिकारी ने 25.04.2023 के आदेश द्वारा उनकी अपील खारिज कर दी, जिसकी सूचना उन्हें 27.04.2023 को दी गई।
विरुद्ध आदेशों से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका पटना उच्च न्यायालय में दायर की, जिसमें 25.04.2023 के अपीलीय आदेश एवं 01.12.2022 के जिला पदाधिकारी के आदेश को निरस्त करने तथा कार्यक्रम पदाधिकारी, एमजीएनआरईजीए के पद पर पुनर्स्थापन एवं परवर्ती लाभ प्रदान करने की प्रार्थना की गई।
उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अनेक तर्क उठाए। प्रमुख दलीलें निम्नलिखित थीं:
- 01.12.2022 का आदेश उन नए आधारों पर आधारित था, जिनका उल्लेख मूल कारण बताओ नोटिस में नहीं था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। दंडादेश केवल उन्हीं आरोपों पर दिया जा सकता है, जो दुराचारी अधिकारी को स्पष्ट रूप से बताए गए हों।
- अधिकारियों ने उनके विस्तृत उत्तरों पर विचार नहीं किया और इसके बजाय बेगूसराय में उनके पूर्व आचरण को ध्यान में रखा, जबकि यह पक्ष कभी भी कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं था।
- आदेश संक्षिप्त, गैर-विस्तृत (नॉन-स्पीकिंग) था और उसमें उनके बचाव पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
- अधिकारियों ने 08.07.2020 की अपनी ही दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया।
इन तथ्यों के समर्थन में, याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, जैसे Commissioner of Income Tax, Mumbai vs. Amitabh Bachchan (2016) 11 SCC 748, M/s Popcorn Entertainment and Others vs. CT Industrial Corporation and Others (Civil Appeal No. 941 of 2007), Md. Yunus Khan vs. State of U.P. and Others (SLP (C) 19318 of 2007), तथा Kranti Associates Pvt. Ltd. vs. Masood Ahmed Khan (2010) 9 SCC 496, के साथ-साथ झारखंड उच्च न्यायालय के खंडपीठ के निर्णय M/s C.J. DARCL Logistics Limited vs. Union of India & Others (Neutral Citation 2023 : JHHC : 4980-DB) पर भरोसा किया।
राज्य की ओर से प्रतिवादी संख्या 2 से 4 ने आदेशों का समर्थन किया। प्रतिवाद-पत्र में उन्होंने 17 रोपण योजनाओं में पाई गई अनियमितताओं की गंभीरता, इसमें संलिप्त धनराशि की मात्रा तथा इस तथ्य पर बल दिया कि याचिकाकर्ता को पहली बार 01.07.2022 का आदेश पारित होने से पहले और पुनः रिमांड के बाद 01.12.2022 के आदेश से पूर्व, दोनों अवसरों पर व्यक्तिगत रूप से सुना गया। उन्होंने बेगूसराय में कथित गबन तथा प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश वाले उनके पूर्व अभिलेखों को भी रेखांकित करते हुए यह दलील दी कि वे निर्दोष नहीं हैं और विवादित आदेश विधिसंगत हैं।
माननीय न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने अभिलेखों का सूक्ष्म परीक्षण किया। न्यायालय ने उल्लेख किया कि 02.02.2022 का कारण बताओ नोटिस दस विशिष्ट बिंदुओं पर आधारित था। किन्तु, 01.07.2022 के प्रथम दंडादेश में छह बिंदुओं पर निष्कर्ष दर्ज किए गए, जो याचिकाकर्ता के अनुसार, मूल दस बिंदुओं से भिन्न थे। अपीलीय प्राधिकारी ने स्वयं इस विसंगति को गंभीर मानते हुए मामले को पुनर्विचार हेतु वापस भेजा था।
रिमांड के बाद, यद्यपि याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई दी गई, तथापि जिला पदाधिकारी ने 01.12.2022 के आदेश में यह दर्ज किया कि याचिकाकर्ता अपनी निष्कलंकता सिद्ध करने हेतु कोई सामग्री या दस्तावेज प्रस्तुत करने में असफल रहीं। उच्च न्यायालय ने माना कि यह दृष्टिकोण वस्तुतः प्रमाण-भार (बर्डन ऑफ प्रूफ) को उलट देता है, जो स्वीकार्य नहीं है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक और समान प्रकृति की कार्यवाहियों में, आरोप लगाने वाले विभाग/प्राधिकारी पर ही उत्तरदायित्व होता है कि वह आरोपित कदाचार को सिद्ध करे। भले ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम के कठोर नियम लागू न हों, तथापि प्राधिकारी को “संभावनाओं के तराजू पर संतुलन” (preponderance of probabilities) के मानक पर प्रासंगिक एवं ठोस सामग्रियों से कदाचार सिद्ध करना होता है। केवल एक संयुक्त जांच प्रतिवेदन अपने आप में मामला समाप्त करने का आधार नहीं हो सकता। उसके निष्कर्षों को ऐसे ढंग से समर्थित और प्रयुक्त किया जाना चाहिए, जो उचित मानक पर दुराचारी अधिकारी के विरुद्ध आरोपित कृत्य को सिद्ध कर सके।
उच्च न्यायालय ने आगे यह भी नोट किया कि 01.12.2022 के आदेश में बेगूसराय में याचिकाकर्ता के कथित पूर्ववर्ती आचरण को उनके विरुद्ध अतिरिक्त आधार के रूप में प्रयुक्त किया गया, जबकि इसका उल्लेख कारण बताओ नोटिस में नहीं किया गया था, न ही इस बिंदु पर उन्हें विशेष रूप से प्रत्युत्तर देने का अवसर दिया गया।
इन्हीं आधारों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया। विशेष रूप से, “audi alteram partem” के नियम – कि किसी व्यक्ति को बिना सुने दंडित नहीं किया जा सकता – का उल्लंघन हुआ क्योंकि:
- याचिकाकर्ता को उन सभी आधारों पर सार्थक रूप से अपना बचाव करने का अवसर नहीं दिया गया, जिन पर अंततः उन्हें दंडित किया गया।
- कदाचार सिद्ध करने के बजाय प्रमाण-भार गलत ढंग से उन पर डालकर उनसे अपनी निष्कलंकता सिद्ध करने की अपेक्षा की गई।
- दूसरे जिले की पूर्ववर्ती शिकायतों/आरोपों का प्रयोग, बिना पूर्व सूचना दिए, कारण बताओ प्रक्रिया में कर लिया गया।
तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने यह घोषित किया कि जिला पदाधिकारी, पटना का 01.12.2022 का विवादित आदेश तथा उससे उत्पन्न 25.04.2023 का अपीलीय आदेश विधिसंगत नहीं हैं।
न्यायालय ने इन दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए मामले को पुनः जिला पदाधिकारी, पटना को वापस भेज दिया। निर्देश दिया गया कि जिला पदाधिकारी को नए सिरे से कारण बताओ नोटिस जारी करने के चरण से कार्यवाही आरंभ करनी होगी। नए नोटिस में प्रस्तावित दंड तथा जिस-जिस आधार पर कार्यवाही प्रस्तावित है, उन्हें स्पष्ट-स्पष्ट अंकित करना होगा। इसके बाद, जिला पदाधिकारी को याचिकाकर्ता को सुनवाई का समुचित अवसर देकर, विधि के अनुरूप कारण-सहित आदेश पारित करना होगा।
रिट याचिका को इसी सीमा तक स्वीकार किया गया। न्यायालय ने इस चरण पर न तो तत्काल पुनर्स्थापन का आदेश दिया और न ही कार्यवाही को पूर्णतः निरस्त किया; बल्कि यह सुनिश्चित किया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध भविष्य में की जाने वाली कोई भी कार्यवाही विधि-सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए ही हो।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय संविदा-आधारित सरकारी कर्मियों, विशेषकर बिहार में एमजीएनआरईजीए जैसी योजनाओं के तहत काम करने वालों के लिए महत्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि भले ही गंभीर अनियमितताओं के आरोप हों, प्राधिकारी उन आधारों पर किसी को दंडित नहीं कर सकते, जिनका स्पष्ट उल्लेख कारण बताओ नोटिस में न किया गया हो। यदि नए आरोपों का सहारा लेना है, तो उन्हें लिखित रूप से नोटिस में सम्मिलित कर संबंधित व्यक्ति को उत्तर देने का अवसर देना अनिवार्य है।
दूसरा, पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी विभाग केवल यह कहकर दायित्व से नहीं बच सकते कि अधिकारी “अपनी निष्कलंकता सिद्ध करने में असफल रही/रहा”। यह विभाग का दायित्व है कि वह प्रबल एवं विश्वसनीय दस्तावेजों के आधार पर कदाचार सिद्ध करे।
तीसरा, न्यायालय ने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि पुराने आरोपों या पूर्व घटनाओं को किसी व्यक्ति के विरुद्ध, बिना पूर्व सूचना और स्पष्टीकरण का अवसर दिए, नए मामले में प्रयोग किया जाए। यह उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके विरुद्ध पूर्व में भी किसी प्रकार की जांच हुई हो; उन मामलों को बिना बताए, चुपचाप नए कार्यवाहियों में उनके खिलाफ उपयोग नहीं किया जा सकता।
एमजीएनआरईजीए और ऐसी ही अन्य योजनाओं के लाभार्थियों एवं श्रमिकों के लिए यह निर्णय यह संदेश भी देता है कि जहाँ एक ओर सार्वजनिक धन से जुड़ी अनियमितताओं को गंभीरता से लिया जाता है, वहीं दूसरी ओर, ऐसी अनियमितताओं के आरोपित अधिकारियों को भी कानून में मजबूत सुरक्षा प्राप्त है। समुचित जांच और निष्पक्ष सुनवाई अनिवार्य है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या एमजीएनआरईजीए के कार्यक्रम पदाधिकारी को उन आधारों पर दंडित किया जा सकता है, जिनका स्पष्ट उल्लेख मूल कारण बताओ नोटिस में न किया गया हो, और क्या प्रमाण-भार उस पर डाला जा सकता है कि वह अपनी निष्कलंकता सिद्ध करे?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि कारण बताओ नोटिस में उल्लिखित न किए गए आधारों पर दंड देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, और प्राधिकारी को स्वयं “संभावनाओं के तराजू पर संतुलन” के मानक पर कदाचार सिद्ध करना होता है। - प्रश्न: क्या किसी अन्य जिले से संबंधित पूर्व आरोपों/पूर्ववृत्त को कारण बताओ कार्यवाही में, बिना पूर्व सूचना दिए, अधिकारी के विरुद्ध प्रयुक्त किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि कारण बताओ नोटिस में प्रकट न किए गए पूर्ववृत्त पर भरोसा करना भी प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है, क्योंकि व्यक्ति को उस बिंदु पर प्रभावी रूप से अपना बचाव करने का अवसर नहीं मिलता। - प्रश्न: यदि अनुशासनात्मक-प्रकृति की कार्यवाही में, किसी संविदा अधिकारी के विरुद्ध पारित दंडादेश प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन से दूषित पाया जाए, तो उचित न्यायिक उपाय क्या है?
उत्तर: न्यायालय ने सेवा समाप्ति तथा अपीलीय आदेशों को रद्द कर मामले को पुनः जिला पदाधिकारी को भेजते हुए निर्देश दिया कि वे प्रस्तावित दंड एवं आधारों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए नया कारण बताओ नोटिस जारी करें, इसके बाद याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देकर कारण-सहित आदेश पारित करें।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में दर्ज है कि याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों पर भरोसा किया: Commissioner of Income Tax, Mumbai vs. Amitabh Bachchan (2016) 11 SCC 748; M/s Popcorn Entertainment and Others vs. CT Industrial Corporation and Others (Civil Appeal No. 941 of 2007); Md. Yunus Khan vs. State of U.P. and Others (SLP (C) 19318 of 2007); Kranti Associates Pvt. Ltd. vs. Masood Ahmed Khan (2010) 9 SCC 496; तथा झारखंड उच्च न्यायालय का निर्णय M/s C.J. DARCL Logistics Limited vs. Union of India & Others (Neutral Citation 2023 : JHHC : 4980-DB)। तथापि, पटना उच्च न्यायालय ने मुख्य रूप से सामान्य प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा प्रमाण-भार के सिद्धांतों पर आधारित होकर ही इस मामले में निर्णय दिया।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 8927 of 2023
मामला शीर्षक: Veena Kumari vs. The State of Bihar & Others
उद्धरण: 2026 (1) PLJR 624
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Sandeep Kumar
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Rakesh Kumar Sharma, Advocate; Mr. Alok Anand, Advocate; Mr. Piyush Kumar Pandey, Advocate
- प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Vikash Kumar, S.C.-11 (State Counsel)
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका, जिसमें कार्यक्रम पदाधिकारी, एमजीएनआरईजीए के रूप में अनुबंध की समाप्ति, वसूली आदेश एवं प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश को चुनौती दी गई तथा पुनर्स्थापन एवं परवर्ती लाभ की प्रार्थना की गई।
निर्णय की तिथि: 09.01.2026
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना, सिविल रिट क्षेत्राधिकार
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूरा निर्णय देखें
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