मामले की पृष्ठभूमि
दोनों संबद्ध रिट याचिकाएँ मुजफ्फरपुर रेल जिला के अंतर्गत रेल पुलिस पोस्ट, हसनपुर में पदस्थापित कॉन्स्टेबलों द्वारा दायर की गई थीं। दोनों अनुशासित पुलिस बल के सदस्य के रूप में कार्यरत थे, जब सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो से विवाद उत्पन्न हुआ।
10.10.2019 को व्हाट्सएप पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें रेलवे पी.पी., हसनपुर के पीछे स्थित एक हालनुमा बैरक दिखाई दे रही थी। इस वीडियो में डीपीसी-334 मनोज कुमार सिंह और एक रेलकर्मी, भूषण कुमार निर्मल, कुर्सियों पर बैठे हुए और मेज पर रखा भोजन करते हुए दिखे। भोजन के दौरान उन्होंने मेज के नीचे से एक बोतल निकाली, उसमें से कुछ तरल पदार्थ गिलासों में डाला और उसे पीया।
उसी वीडियो में, सीडब्ल्यूजेसी सं. 1208/2021 के याचिकाकर्ता, जो एक कॉन्स्टेबल हैं, को कमरे में सोते हुए देखा गया। सीडब्ल्यूजेसी सं. 1528/2021 के याचिकाकर्ता, जो चालक कॉन्स्टेबल हैं, को सब-इंस्पेक्टर बैजनाथ सिंह से रेनू देवी नाम की एक महिला शराब तस्कर के बारे में बात करते हुए दिखाया गया। यह आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ताओं को स्वयं शराब पीते हुए देखा गया।
वायरल वीडियो के आधार पर समस्तीपुर रेल की उप पुलिस अधीक्षक ने प्रारंभिक जांच की। उन्होंने 12.10.2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर रेल, मुजफ्फरपुर के पुलिस अधीक्षक ने एक आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। तदनुसार रेल समस्तीपुर (हसनपुर) थाना कांड सं. 179/2019, 16.10.2019 को बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 37(a) के तहत दर्ज किया गया।
12.10.2019 को संबंधित पुलिसकर्मियों के रक्त एवं मूत्र के नमूने लिये गये और 14.10.2019 को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल), मुजफ्फरपुर भेजे गये। एफएसएल ने 04.01.2020 को अपनी रिपोर्ट दी। इसी बीच, याचिकाकर्ताओं को निलंबित कर दिया गया और उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही का आदेश दिया गया।
अलग-अलग विभागीय जांचें प्रारंभ की गईं: प्रथम याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय जांच सं. 16/2019 तथा द्वितीय के विरुद्ध सं. 14/2019। प्रत्येक को आरोप पत्र जारी किया गया, जिसमें अनुशासित बल के सदस्य के रूप में कदाचार एवं आचरण के प्रतिकूल व्यवहार का आरोप था, जो मूलत: इस आधार पर था कि वे उस कमरे में उपस्थित थे जहाँ कथित रूप से शराबनुमा पदार्थ का सेवन किया जा रहा था।
चार्जशीट के साथ तीन दस्तावेज संलग्न थे: निलंबन आदेश, उप पुलिस अधीक्षक की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट तथा वायरल वीडियो वाली एक कॉम्पैक्ट डिस्क। दो गवाहों का नाम सूचीबद्ध था: प्रारंभिक जांच की रिपोर्ट तैयार करने वाली डिप्टी एस.पी. रेल पुलिस समस्तीपुर और पुलिस सब-इंस्पेक्टर शिव शंकर सिंह।
याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत लिखित बयान दाखिल कर आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने शराब का सेवन नहीं किया, मनोज कुमार सिंह और भूषण कुमार निर्मल कोल्ड ड्रिंक ले रहे थे, और वीडियो में उन्हें उन व्यक्तियों के साथ खाते या पीते हुए नहीं दिखाया गया है।
जांच के दौरान सूचीबद्ध दोनों गवाहों से जिरह सहित साक्ष्य लिया गया। जांच पदाधिकारी ने 20.01.2020 को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें आरोपों को सिद्ध माना गया। इसके बाद दोनों याचिकाकर्ताओं को द्वितीय कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिनका उन्होंने उत्तर दिया। उनके स्पष्टीकरण के बावजूद रेल, मुजफ्फरपुर के पुलिस अधीक्षक ने 27.02.2020 (मेमो सं. 286 और 287) के आदेशों द्वारा दोनों याचिकाकर्ताओं को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
अपीलें अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, विधि एवं व्यवस्था, बिहार, पटना के समक्ष दायर की गईं। ये अपीलें 26.05.2020 (मेमो सं. 173 और 172) के आदेशों द्वारा खारिज कर दी गईं। तत्पश्चात दोनों याचिकाकर्ता पटना उच्च न्यायालय में उसकी सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत पहुँचे, जहाँ उन्होंने बर्खास्तगी आदेशों, अपीलीय आदेशों, जांच रिपोर्टों तथा आरोप पत्रों को चुनौती दी।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय न्यायमूर्ति श्री हरीश कुमार की अध्यक्षता में, दोनों रिट याचिकाओं की एक साथ सुनवाई की, क्योंकि वे एक ही घटना से उत्पन्न हुई थीं, आरोप समान थे और तथ्य भी लगभग एक जैसे थे।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आरोप अस्पष्ट हैं और किसी ठोस सामग्री से समर्थित नहीं हैं। उन्होंने यह रेखांकित किया कि वायरल वीडियो 3–4 महीने पुराना था; उन्हें नहीं पता कि इसे किसने रिकॉर्ड या प्रसारित किया; और वीडियो में भी एक कॉन्स्टेबल केवल सोते हुए तथा दूसरा सब-इंस्पेक्टर से बात करते हुए दिखाई देता है। महत्त्वपूर्ण यह कि उन्हें शराब पीते हुए नहीं दिखाया गया।
उन्होंने एफएसएल रिपोर्ट पर भी प्रहार किया। उनके अनुसार, वीडियो में दर्शाई घटना जांच शुरू होने से 3–4 महीने पूर्व की थी। उनके रक्त एवं मूत्र नमूने 12.10.2019 को ही लिये गये और 14.10.2019 को एफएसएल भेजे गये। 04.01.2020 की दिनांकित एफएसएल रिपोर्ट में कुछ मूत्र नमूनों (चिह्नित B2, B3, B4, B5) में एथिल अल्कोहल पाई गई, पर कई अन्य नमूनों (A1–A5, B1) में नहीं। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि 12.10.2019 को उनके मूत्र में शराब की उपस्थिति भी मान ली जाए, तो भी वह कई महीने पुरानी घटना से संबद्ध नहीं हो सकती।
उन्होंने यह भी इंगित किया कि एफएसएल रिपोर्ट मूल चार्जशीट का हिस्सा नहीं थी, न ही किसी गवाह को बुलाकर उस रिपोर्ट को साबित किया गया, फिर भी जांच पदाधिकारी ने इस अप्रमाणित दस्तावेज पर अत्यधिक निर्भरता रखी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पूरा निष्कर्ष केवल कमरे में उनकी उपस्थिति के संदेह और गलत तरीके से प्रयोग की गई फॉरेंसिक रिपोर्ट पर आधारित था, न कि कदाचार के किसी वास्तविक सबूत पर।
राज्य ने अनुशासनात्मक प्रक्रिया का बचाव किया। उसका कहना था कि कार्यवाही बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के अंतर्गत की गई। राज्य के अनुसार वायरल वीडियो ने पुलिस बल की छवि धूमिल की और प्रारंभिक जांच, प्राथमिकी दर्ज करने, निलंबन और विभागीय जांच को न्यायोचित बनाया। राज्य ने यह भी कहा कि एफएसएल रिपोर्ट से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ताओं ने एक सूबे में, जहाँ पूर्ण मद्य निषेध लागू है, शराब पी, और यह कृत्य अनुशासन का गंभीर उल्लंघन है। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं को अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया गया।
रिकॉर्डों का अवलोकन करने के बाद, न्यायालय ने पहले निर्विवाद तथ्यात्मक क्रम को दर्ज किया। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में ही यह उल्लेख था कि वीडियो में दर्शित घटना वीडियो के वायरल होने और 12.10.2019 को प्राथमिकी दर्ज होने से 3–4 महीने पूर्व की है। रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया था कि वीडियो में याचिकाकर्ताओं को शराब पीते हुए नहीं दिखाया गया। सभी आरोपितों ने यह स्पष्टीकरण दिया था कि मनोज कुमार सिंह और भूषण कुमार निर्मल कोल्ड ड्रिंक ले रहे थे, शराब नहीं।
रक्त एवं मूत्र नमूने 12.10.2019 को लिये गये और बाद में परीक्षण किया गया। एफएसएल रिपोर्ट में कुछ मूत्र नमूनों में एथिल अल्कोहल तथा अन्य में उसकी अनुपस्थिति दर्ज है और यही रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बनी।
न्यायालय ने आरोप पत्र में अंकित साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। वहाँ केवल तीन दस्तावेज सूचीबद्ध थे: निलंबन आदेश, प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और वायरल वीडियो की सीडी। एफएसएल रिपोर्ट को भरोसा किए जाने वाले दस्तावेज के रूप में सूचीबद्ध ही नहीं किया गया था और न ही किसी गवाह को जांच पदाधिकारी के समक्ष बुलाकर उस रिपोर्ट को साबित करने या उसकी सामग्री समझाने का प्रयास किया गया।
फिर न्यायालय ने दोनों विभागीय गवाहों के मौखिक साक्ष्य पर विचार किया। दोनों ने केवल इतना कहा कि वीडियो में दो व्यक्ति किसी शराबनुमा पदार्थ का सेवन करते दिखते हैं और याचिकाकर्ता कमरे में मौजूद थे — एक सो रहा था, दूसरा बैठा बात कर रहा था। जिरह में उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया कि याचिकाकर्ताओं को भोजन करते या शराब पीते हुए नहीं देखा गया। यहाँ तक कि वीडियो में दिखी बोतल सामान्य शराब की बोतल जैसी नहीं लगती थी और जिन व्यक्तियों को शराब पीते दिखाया गया, उन्हें याचिकाकर्ताओं से बात करते नहीं दिखाया गया।
इसके बावजूद जांच पदाधिकारी ने याचिकाकर्ताओं को दोषी ठहराया। उन्होंने स्वीकार किया कि गवाह याचिकाकर्ताओं द्वारा शराब सेवन सिद्ध नहीं कर सके, परंतु इस आधार पर भरोसा किया कि आपराधिक जांच के दौरान याचिकाकर्ताओं को आरोपी बनाया गया था और उनके मूत्र नमूनों में एथिल अल्कोहल पाया गया था। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं ने निषेध का उल्लंघन अवश्य किया होगा।
न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की दलील स्थापित विधि के प्रतिकूल है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi v. Punjab National Bank (2009) 2 SCC 570 का हवाला देते हुए न्यायालय ने दोहराया कि आपराधिक जांच के दौरान संकलित सामग्री, जैसे प्राथमिकी या जांच पत्रावली, तब तक विभागीय कार्यवाही में साक्ष्य नहीं मानी जा सकती जब तक उन्हें विधिवत गवाहों के माध्यम से सिद्ध न किया जाए।
न्यायालय ने Sher Bahadur v. Union of India (2002) 7 SCC 142 भी उद्धृत किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य को आरोपित अधिकारी और कथित कदाचार के बीच कड़ी स्थापित करनी चाहिए; मात्र संदेह या अप्रासंगिक सामग्री, चाहे वह कितनी भी अधिक क्यों न हो, विधिक साक्ष्य नहीं मानी जा सकती।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने पाया कि एफएसएल रिपोर्ट को वायरल वीडियो में दर्शित घटना से जोड़ा ही नहीं जा सकता। वैज्ञानिक दृष्टि से, शराब रक्त में अधिकतम लगभग 12 घंटे तक और मूत्र में लगभग 24–80 घंटे तक ही पता लगाई जा सकती है। अतः अक्टूबर 2019 में किया गया मूत्र परीक्षण कई महीने पूर्व कथित रूप से हुई शराब सेवन की घटना को प्रमाणित नहीं कर सकता।
न्यायालय ने बुनियादी फॉरेंसिक स्थिति भी स्पष्ट की: रक्त में अल्कोहल की मात्रा नमूना लेने के समय की स्थिति को दर्शाती है और इसे तभी स्वीकार किया जाता है जब नमूना उचित तरीके से लिया, संरक्षित और अभिलेखित किया गया हो। मूत्र परीक्षण हाल के सेवन को दर्शाते हैं, पर निश्चित समय नहीं बता सकते और वे पतला होने या संदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इस आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि एफएसएल रिपोर्ट यह सिद्ध नहीं कर सकती कि याचिकाकर्ताओं ने पहले की घटना के समय शराब का सेवन किया था।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के प्रश्न पर न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) 7 SCC 1 पर भरोसा किया। उस निर्णय में यह अनिवार्य किया गया है कि सीडी या वीडियो क्लिप जैसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के लिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B(4) के अंतर्गत प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। ऐसे प्रमाणपत्र के बिना वीडियो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
न्यायालय ने पाया कि विभागीय जांच में धारा 65B का कोई प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, सीडी में निहित वायरल वीडियो क्लिप को उसके निर्माता या किसी अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से साबित नहीं किया गया, वीडियो रिकॉर्ड या प्रसारित करने वाले मोबाइल फोन को न तो जब्त किया गया और न ही प्रदर्श के रूप में पेश किया गया, और कथित शराब सेवन की घटना के किसी प्रत्यक्षदर्शी को भी नहीं बुलाया गया। अतः वीडियो की कोई वैधानिक साक्ष्यात्मक महत्ता नहीं थी।
न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णयों Bharat Prasad Yadav v. State of Bihar (CWJC No. 18331 of 2019) और Sonu Kumar v. State of Bihar (CWJC No. 17527 of 2019) से भी समर्थन लिया। उन मामलों में भी वायरल शराब वीडियो के आधार पर की गई विभागीय बर्खास्तगी केवल इस कारण रद्द कर दी गई थी कि विधिसम्मत रूप से स्वीकार्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के लिए साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया था।
आगे, न्यायालय ने अपने न्यायिक पुनरावलोकन की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए Kuldeep Singh v. Commissioner of Police (1999) 2 SCC 10 का हवाला दिया। उस निर्णय के अनुसार उच्च न्यायालय विभागीय निष्कर्षों में तब हस्तक्षेप कर सकता है, जब निष्कर्ष अवैध, साक्ष्यविहीन हों या ऐसे हों, जिन पर कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं पहुँच सकता।
रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध मामला पूरी तरह इस संदेह पर आधारित था कि वे उस कमरे में मौजूद थे जहाँ दो अन्य व्यक्तियों ने कथित रूप से शराब पी। जांच पदाधिकारी की स्पष्ट finding थी कि किसी भी गवाह या दस्तावेज से याचिकाकर्ताओं द्वारा शराब सेवन का आरोप समर्थित नहीं है। आरोप को टिकाए रखने के लिए जिस एफएसएल रिपोर्ट पर एकमात्र आधार के रूप में भरोसा किया गया, वह समय की दृष्टि से घटना से असंबद्ध थी, उसे चार्जशीट के साथ दिया ही नहीं गया था और न ही गवाहों के माध्यम से सिद्ध किया गया था। ऐसे अप्रमाणित और वैज्ञानिक रूप से अप्रासंगिक दस्तावेज पर निर्भरता ने जांच निष्कर्षों को अस्थिर बना दिया।
न्यायालय ने एक गंभीर प्रक्रियागत त्रुटि भी नोट की: विभागीय प्रेजेंटिंग ऑफिसर ने प्रभावी ढंग से मामला प्रस्तुत ही नहीं किया। ऐसा प्रतीत हुआ कि स्वयं जांच पदाधिकारी ने प्रेजेंटिंग ऑफिसर की भूमिका निभाई, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of Uttar Pradesh v. Saroj Kumar Sinha (2010) 2 SCC 772 और इस न्यायालय के निर्णय Panchanan Kumar v. Bihar State Electricity Board (1996) 1 PLJR 401 में स्पष्ट की गई भूमिकाओं के विपरीत है।
अपील प्राधिकारी के संबंध में न्यायालय ने पाया कि अपीलीय आदेश पूर्णत: गैर-कारणयुक्त (non-speaking) हैं। उनमें याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए किसी भी आधार पर विचार नहीं किया गया तथा अपील प्राधिकारी पर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 27 के तहत डाले गए दायित्वों की उपेक्षा की गई।
अंततः न्यायालय ने माना कि अनुशासनात्मक तथा अपीलीय दोनों आदेश “बिना साक्ष्य और सतही” हैं और इसलिए “पूर्णत: अन्यायपूर्ण, अवैध और अस्थिर” हैं। न्यायालय ने 27.02.2020 की दिनांकित मेमो सं. 286 और 287 (बर्खास्तगी आदेश) तथा 26.05.2020 की दिनांकित मेमो सं. 172 और 173 (अपीलीय आदेश) को निरस्त कर दिया। दोनों रिट याचिकाएँ स्वीकार कर ली गईं।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को तत्काल सेवा में पुनर्नियुक्त किया जाए और सभी परिणामी लाभ निर्णय की प्रति प्राप्ति या प्रस्तुति की तारीख से बारह सप्ताह के भीतर अदा किए जाएँ। पक्षकारों को अपने-अपने व्यय स्वयं वहन करने के लिए कहा गया और लंबित प्रार्थना-पत्रों का निपटारा कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर बिहार के निषेध व्यवस्था के तहत कार्यरत पुलिसकर्मियों के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि केवल इस आधार पर कि कोई व्यक्ति उस कमरे में उपस्थित था जहाँ अन्य लोग संभवतः शराब पी रहे थे, या केवल किसी अप्रमाणित वीडियो क्लिप के आधार पर, किसी को सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने बल देकर कहा है कि विभागीय दंड विधिक साक्ष्य पर आधारित होना चाहिए, न कि मात्र संदेह या किसी वायरल वीडियो से उत्पन्न जनाक्रोश पर। फॉरेंसिक रिपोर्टें उसी विशिष्ट घटना से संबंधित हों और उन्हें जांच के दौरान विधिवत सिद्ध किया जाए। व्हाट्सएप वीडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य साक्ष्य अधिनियम की तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करें।
निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि अनुशासनात्मक और अपीलीय प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा, 2005 के नियमों का पालन करना होगा और कारणयुक्त आदेश देने होंगे। जब वे ऐसा करने में असफल रहते हैं, तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर गलत तरीके से बर्खास्त कर्मचारियों के अधिकारों की पुनर्स्थापना कर सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या केवल एक वायरल वीडियो और एफएसएल मूत्र रिपोर्ट के आधार पर, जो कथित रूप से शराब सेवन की ओर संकेत करती हो, जबकि याचिकाकर्ताओं को सीधे शराब पीते हुए नहीं देखा गया, उन्हें सेवा से बर्खास्त किया जा सकता था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि न तो वायरल वीडियो और न ही एफएसएल रिपोर्ट विधिक रूप से स्वीकार्य या पर्याप्त थी, जिससे यह सिद्ध हो कि याचिकाकर्ताओं ने शराब पी। निष्कर्ष केवल संदेह और अप्रमाणित दस्तावेजों पर आधारित थे, जो “कोई साक्ष्य नहीं” की श्रेणी में आते हैं। - प्रश्न: क्या विभागीय और अपीलीय प्राधिकारी कानून तथा बिहार सरकारी सेवक (सीसीए) नियमावली, 2005 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना, अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक एवं फॉरेंसिक साक्ष्य पर निर्भर हो सकते थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने गंभीर प्रक्रियागत चूकों को पाया, जिनमें साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत वीडियो को सिद्ध न करना और एफएसएल रिपोर्ट को साबित करने हेतु गवाह प्रस्तुत न करना शामिल था। परिणामस्वरूप अनुशासनात्मक और अपीलीय आदेश अवैध और अस्थिर ठहराए गए तथा रद्द कर दिए गए। - प्रश्न: जब न्यायालय ने निष्कर्षों को विकृत तथा साक्ष्यरहित पाया, तो याचिकाकर्ताओं को क्या राहत प्रदान की गई?
उत्तर: न्यायालय ने उनके तत्काल पुनर्नियोजन का निर्देश दिया, साथ ही सभी परिणामी लाभ बारह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank & Ors., (2009) 2 SCC 570
- Sher Bahadur v. Union of India & Ors., (2002) 7 SCC 142
- Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal & Ors., (2020) 7 SCC 1
- Sonu Kumar v. The State of Bihar & Ors., CWJC No. 17527 of 2019
- Bharat Prasad Yadav v. The State of Bihar & Ors., CWJC No. 18331 of 2019
- Kuldeep Singh v. Commissioner of Police & Ors., (1999) 2 SCC 10
- State of Uttar Pradesh & Ors. v. Saroj Kumar Sinha, (2010) 2 SCC 772
- Panchanan Kumar v. The Bihar State Electricity Board & Ors., (1996) 1 PLJR 401
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1208 of 2021; Civil Writ Jurisdiction Case No. 1528 of 2021
मामला शीर्षक: Srikant Prasad v. The State of Bihar & Ors.; Bipin Kumar v. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2026(1) PLJR 276
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar
निर्णय की तारीख: 22.08.2025
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता (दोनों मामलों में): Mr. Ramakant Sharma, Senior Advocate; Mr. Rakesh Kumar Sharma, Advocate; Mr. Rabinder Kumar, Advocate
राज्य की ओर से अधिवक्ता (CWJC No. 1208 of 2021 में): Md. Nadim Seraj, GP-5; Mr. Shailesh Kumar, AC to GP-5
राज्य की ओर से अधिवक्ता (CWJC No. 1528 of 2021 में): Mrs. Babita Kumari, AC to SC-1
मामले का स्वरूप: अनुशासनात्मक कार्यवाही से उत्पन्न पुलिस कॉन्स्टेबलों के विरुद्ध सेवा से बर्खास्तगी तथा विभागीय अपीलों की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दायर रिट याचिकाएँ
निर्णय की लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTIwOCMyMDIxIzEjTg==-946TVqyZ1Ws=
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