मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने विज्ञापन संख्या 26 वर्ष 2023 के तहत कक्षा I से V के लिए स्कूल शिक्षक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन किया था। यह भर्ती बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लिए की गई थी, जिनमें अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) श्रेणी भी शामिल थी, जिसके अंतर्गत याचिकाकर्ता ने आवेदन किया।
इस पद के लिए अभ्यर्थियों के पास न्यूनतम शैक्षणिक तथा शिक्षक प्रशिक्षण योग्यताएँ होना आवश्यक था। विज्ञापन में उन अभ्यर्थियों को भी पात्र माना गया था, जिनके पास स्नातक के साथ डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन हो, या कम से कम 50% अंकों के साथ स्नातक तथा इसके साथ बी.एड की डिग्री हो।
टीचर्स रिकूटमेंट एग्जामिनेशन 1 (TRE-1) के ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भरते समय, याचिकाकर्ता से एक कॉलम में गलती हो गई। जिस कॉलम में अभ्यर्थी को बी.एड, बी.एड-एम.एड, डी.एल.एड, बी.ए.डी, बी.एससी.एड या दो वर्षीय डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन जैसे विकल्पों में से किसी एक प्रशिक्षण योग्यता का चयन करना था, उसमें उसने बी.एड का चयन कर दिया। हालांकि, उसी ऑनलाइन आवेदन के अगले पृष्ठ पर उसने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि उसके पास डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed) है और उसने बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड द्वारा जारी डी.एल.एड उत्तीर्ण प्रमाणपत्र और अंकपत्र दोनों अपलोड किए।
आयोग ने उसका आवेदन स्वीकार कर लिया, उसे रोल नंबर 621894 तथा पंजीकरण संख्या के साथ प्रवेश पत्र जारी किया और उसे भाषा की अर्हक पत्रिका तथा सामान्य अध्ययन पत्रिका में शामिल होने की अनुमति दी। सामान्य अध्ययन में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) श्रेणी के लिए कट-ऑफ अंक 44 निर्धारित किए गए थे। प्रकाशित परिणाम के अनुसार, याचिकाकर्ता ने सामान्य अध्ययन में 45 अंक और अर्हक पत्रिका में 46 अंक प्राप्त किए।
कट-ऑफ से अधिक अंक होने और सही शैक्षणिक योग्यता संबंधी दस्तावेज अपलोड करने के बावजूद, याचिकाकर्ता का नाम उन सफल अभ्यर्थियों की सूची में शामिल नहीं हुआ जिन्हें अस्थायी रूप से जिले आवंटित किए गए थे। इसके बाद उसने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की और प्रार्थना की कि उसे डी.एल.एड अभ्यर्थी मानते हुए अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) श्रेणी में उसके लिए संशोधित मेधा सूची तैयार की जाए।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मूल विवाद यह था कि क्या याचिकाकर्ता द्वारा ऑनलाइन फॉर्म के एक कॉलम में “बी.एड” का अनजाने में चयन, जबकि उसने अन्यत्र अपनी डी.एल.एड योग्यता का खुलासा और प्रमाणित किया था, इस आधार पर उसकी नियुक्ति से वंचित किया जा सकता है, जबकि वह कट-ऑफ अंक पार कर चुकी थी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह गलती स्पष्ट रूप से अनजाने में हुई और तुच्छ थी। उन्होंने यह इंगित किया कि उसी ऑनलाइन फॉर्म के दूसरे भाग में याचिकाकर्ता ने सही-सही यह दर्ज किया था कि वह डी.एल.एड धारक है। उसने डी.एल.एड प्रमाणपत्र एवं अंकपत्र भी अपलोड किए थे, जिससे उसकी वास्तविक योग्यता के बारे में कोई संदेह नहीं रहता।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि विज्ञापन संख्या 26 वर्ष 2023 के खंड 4(क) के अनुसार, दोनों प्रकार के अभ्यर्थी — स्नातक + डी.एल.एड तथा 50% अंकों सहित स्नातक + बी.एड — कक्षा I से V के शिक्षक पद के लिए आवेदन करने के पात्र थे। अतः भले ही उसे बी.एड अभ्यर्थी माना जाए, वह विज्ञापन के आधार पर prima facie पात्र ही थी। याचिकाकर्ता ने गलती सुधारने के लिए हलफनामों के साथ आवेदन भी दिए, पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई।
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Vashist Narayan Kumar v. State of Bihar & Ors., 2024 LiveLaw (SC) 1 पर विशेष रूप से भरोसा किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि आवेदन पत्र में ऐसी तुच्छ गलती, जिसका चयन प्रक्रिया में कोई योगदान न हो, को अभ्यर्थी को उसकी मेधा के लाभ से वंचित करने का आधार नहीं माना जा सकता, और राज्य को “राई का पहाड़” नहीं बनाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसका मामला इसी सिद्धांत के अंतर्गत आता है क्योंकि उसकी गलती का न तो उसके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ा और न ही उसकी पात्रता पर, और वह पहले ही कट-ऑफ पार कर चुकी थी।
दूसरी ओर, बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की गलती के लिए आयोग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आयोग ने कहा कि सार्वजनिक सूचनाओं और grievance portal के माध्यम से अभ्यर्थियों को अपने फॉर्म में त्रुटियाँ सुधारने का बार-बार अवसर दिया गया था, परंतु याचिकाकर्ता ने इन अवसरों का लाभ नहीं उठाया। यह भी प्रस्तुत किया गया कि TRE-1 से TRE-3 तक की भर्ती प्रक्रियाएँ पूरी हो चुकी हैं और नियुक्तियाँ हो चुकी हैं, अतः इस चरण पर किसी भी हस्तक्षेप से प्रक्रिया की अंतिमता प्रभावित हो सकती है।
विज्ञापन के खंड 7(ख) और खंड 11 का संदर्भ लेते हुए आयोग ने यह रेखांकित किया कि परीक्षा अभ्यर्थियों द्वारा ऑनलाइन फॉर्म में भरी गई सूचनाओं के आधार पर ही ली जानी थी। आयोग को उन विवरणों को सत्य मानकर मेधा सूची तैयार करनी थी, जबकि दस्तावेजों का सत्यापन बाद में नियुक्ति विभाग द्वारा किया जाना था। आयोग ने यह भी दावा किया कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय जन्मतिथि सुधार से संबंधित था और उनके अनुसार वर्तमान मामले में लागू नहीं था।
राज्य के अधिवक्ता ने आयोग के रुख का समर्थन किया। खंड 11 का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता को कोई गलती का एहसास हुआ था तो वह अपने पूर्व आवेदन को रद्द कर निर्धारित editing window के भीतर नया आवेदन दाखिल कर सकती थी। शुल्क भुगतान के बाद फॉर्म में संशोधन संभव नहीं था। राज्य के अनुसार, इतनी देरी से किसी सुधार की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि विज्ञापन की शर्तों का कड़ाई से पालन आवश्यक है।
न्यायालय ने पहले यह सामान्य विधिक स्थिति नोट की कि किसी विज्ञापन और पात्रता मानदंडों की शर्तों का कड़ाई से पालन महत्त्वपूर्ण होता है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Tamil Nadu & Ors. v. G. Hemalathaa & Anr., (2020) 19 SCC 430 तथा State of Gujarat & Ors. v. Arvind Kumar T. T. Tiwary, (2012) 9 SCC 545 का उल्लेख किया गया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि जो अभ्यर्थी मूल पात्रता से वंचित हो, उसे नियुक्त नहीं किया जा सकता और ऐसी कमी बाद में दूर नहीं की जा सकती।
हालाँकि, तत्पश्चात न्यायालय ने T. Jaikumar v. A. Gopu & Anr., (2008) 9 SCC 403 का संदर्भ दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी अभ्यर्थी को चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देना, बाद में किसी कमी के पाए जाने पर उसे अपात्र ठहराने से प्राधिकार को नहीं रोकता। साथ ही यह भी कहा गया कि न्यायालय या अधिकरण यह जाँच सकते हैं कि बहिष्करण का आधार युक्तिसंगत है या मनमाना; यदि कारण अव्यावहारिक या मनमाना हो तो हस्तक्षेप उचित है और estoppel जैसे सिद्धांत मनमानी कार्यवाही को संरक्षण नहीं दे सकते।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने विज्ञापन की शब्दावली और मामले के विशिष्ट तथ्यों की ओर रुख किया। खंड 4 में कक्षा I–V के शिक्षकों के लिए शैक्षणिक और प्रशिक्षण योग्यताओं का प्रावधान था और इसमें स्पष्ट रूप से डी.एल.एड तथा बी.एड दोनों मार्गों को मान्यता दी गई थी। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के ऑनलाइन फॉर्म (परिशिष्ट P/5 श्रृंखला) की बारीकी से जाँच की और पाया कि सभी योग्यताएँ एक ही पंक्ति में दी गई थीं, जिनमें से किसी एक का चयन करना था। याचिकाकर्ता ने वह विकल्प चुना जिसमें सभी प्रशिक्षण योग्यताएँ, जिनमें बी.एड भी शामिल था, समाहित थीं। लेकिन दूसरे कॉलम में उसने विशेष रूप से यह घोषित किया था कि उसके पास 50% अंकों सहित स्नातक और बी.एड है और साथ ही साथ उसने अपना डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन भी प्रकट किया।
न्यायालय इस बात से अवगत था कि खंड 11 के तहत आवेदन पत्र में editing केवल शुल्क भुगतान तक ही अनुमत थी और आयोग अभ्यर्थियों की घोषणाओं पर ही निर्भर था। फिर भी न्यायालय ने यह नोट किया कि आयोग का यह कहने का मामला ही नहीं था कि याचिकाकर्ता अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) के लिए निर्धारित कट-ऑफ अंक प्राप्त करने में विफल रही। उसके अंक कट-ऑफ से अधिक थे और उसका डी.एल.एड योग्यता से संबंधित दस्तावेज शुरू से ही अभिलेख में उपलब्ध थे।
ऑनलाइन फॉर्म में इस प्रकार की त्रुटियों की प्रकृति को समझने के लिए न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय Kendriya Vidyalaya Sangathan v. Geetanjali Yadav, 2025 SCC Online Del 6420 का सहारा लिया। उस मामले में प्राथमिक शिक्षक (OBC वर्ग) के पद के लिए अभ्यर्थी ने ऑनलाइन फॉर्म में गलती से “Graduation + B.Ed” का विकल्प चुन लिया था, जबकि उसे D.El.Ed/JBT/BTC चुनना चाहिए था, क्योंकि सॉफ्टवेयर में केवल दो ही विकल्प उपलब्ध थे, जबकि अन्य जगह पर उसने अपने डी.एल.एड के अंक सही-सही भरे थे। कट-ऑफ से अधिक अंक पाने के बावजूद उसे शॉर्टलिस्ट नहीं किया गया। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने उसकी याचिका स्वीकार की और दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस निर्णय को बरकरार रखा, यह कहते हुए कि सॉफ्टवेयर डिजाइन में एक तकनीकी प्रविष्टि, सारभूत पात्रता पर हावी नहीं हो सकती और ऐसी गलती को मिथ्याप्रस्तुति नहीं माना जा सकता।
पटना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Dolly Chhanda v. Chairman, JEE, (2005) 9 SCC 779 में प्रतिपादित सिद्धांत की भी पुनः समीक्षा की, जिसमें कहा गया था कि प्रमाण प्रस्तुत करने से संबंधित हर छोटी-छोटी नियम उल्लंघन के कारण स्वतः ही उम्मीदवारी निरस्त नहीं की जानी चाहिए। न्यायालय ने “de minimis non curat lex” — अर्थात कानून तुच्छ बातों की परवाह नहीं करता — इस विधिक सूक्ति का उल्लेख कर यह रेखांकित किया कि तुच्छ गलतियाँ सारभूत न्याय को विफल नहीं कर सकतीं।
इसी दृष्टिकोण को सुदृढ़ करते हुए न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Vashist Narayan Kumar के अनुच्छेद 19 से उद्धरण दिया। वहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आवेदन पत्र में तुच्छ त्रुटि, जिसका चयन प्रक्रिया में कोई योगदान न हो, किसी योग्य अभ्यर्थी की उम्मीदवारी को अस्वीकार करने का आधार नहीं बन सकती। न्यायालय ने डिजिटल विभाजन और साइबर कैफे से आवेदन भरने जैसी जमीनी हकीकतों को भी स्वीकार किया, जिनके कारण ऐसी गलतियाँ हो सकती हैं।
पूरा अभिलेख देखने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा कोई दमन (suppression) या मिथ्याप्रस्तुति (misrepresentation) नहीं की गई थी। उसने स्पष्ट रूप से अपना डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन बताया था और उससे संबंधित प्रमाणपत्र तथा अंकपत्र अपलोड किए थे। बी.एड का विकल्प चुनने की गलती को न्यायालय ने अनजाने में हुई और तुच्छ त्रुटि माना। चूँकि उसने कट-ऑफ अंक प्राप्त कर लिए थे और आवश्यक पात्रता रखती थी, उसे इस मामूली गलती के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने Collector, Land Acquisition, Anantnag v. Mst. Katiji, AIR 1987 SC 1353 का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह बल दिया था कि न्यायपालिका का सम्मान इसलिए नहीं है कि वह तकनीकी आधार पर अन्याय को वैध कर दे, बल्कि इसलिए है कि वह अन्याय को दूर करती है। इसी से मार्गदर्शित होकर पटना उच्च न्यायालय ने कड़े तकनीकी दृष्टिकोण के बजाय न्यायोन्मुख दृष्टिकोण अपनाया।
अंततः न्यायालय ने रिट याचिका में दम पाया और उसे स्वीकार कर लिया। उसने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता को कक्षा I–V के स्कूल शिक्षक पद पर नियुक्ति के उद्देश्य से, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) श्रेणी के अंतर्गत, बिहार लोक सेवा आयोग की टीचर्स रिकूटमेंट एग्जामिनेशन 1 में प्राप्त अंकों के आधार पर, डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन के रूप में माना जाए।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि विज्ञापन संख्या 26 वर्ष 2023 के अंतर्गत कोई पद उपलब्ध नहीं है और ऐसे पदों को किसी अन्य विज्ञापन में आगे बढ़ा दिया गया है, तो याचिकाकर्ता की नियुक्ति मौजूदा रिक्तियों के विरुद्ध समायोजित की जाए, बिना पहले से चयनित अभ्यर्थियों की मेधा सूची से छेड़छाड़ किए। ज्येष्ठता और अन्य लाभों के संबंध में उसे विज्ञापन संख्या 26 वर्ष 2023 के अंतर्गत अत्यंत पिछड़ा वर्ग (महिला) श्रेणी की अंतिम अभ्यर्थी माना जाएगा, सिवाय इसके कि उसे कोई वास्तविक वित्तीय लाभ पूर्वकाल से नहीं दिया जाएगा।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो सरकारी नौकरियों के लिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं और छोटी तकनीकी गलतियों के कारण अवसर खोने से भयभीत रहते हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जहाँ अभ्यर्थी अन्यथा पूर्ण रूप से पात्र हो, सही दस्तावेज प्रस्तुत कर चुका हो और कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त कर चुका हो, वहाँ ऑनलाइन फॉर्म के किसी एक हिस्से में की गई मामूली गलती से स्वतः ही उसके भविष्य को नष्ट नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय निष्पक्षता और प्रशासनिक सुविधा के बीच संतुलन भी स्थापित करता है। जहाँ नियुक्ति प्राधिकारी विज्ञापन की शर्तों का पालन करने और मूल पात्रता में किसी प्रकार की ढील न देने के लिए बाध्य हैं, वहीं उन्हें यह भी याद दिलाया गया है कि तुच्छ और तकनीकी गलतियों के पीछे छिपकर वे तब नहीं बच सकते जब गलती चयन प्रक्रिया को प्रभावित ही नहीं करती।
बिहार में शिक्षक भर्ती, विशेषकर बिहार लोक सेवा आयोग की टीचर्स रिकूटमेंट एग्जामिनेशन के संदर्भ में, यह मामला यह दर्शाता है कि न्यायालय मेधावी अभ्यर्थियों को मामूली तकनीकी आधारों पर अनुचित रूप से बाहर किए जाने से बचाने के लिए तत्पर हैं, जबकि साथ ही अंतिम मेधा सूची और पहले से की गई नियुक्तियों की अखंडता को भी संरक्षित रखते हैं।
विवादित विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या ऐसा अभ्यर्थी, जो अन्यथा पात्र है और कट-ऑफ अंक प्राप्त कर चुका है, केवल इस आधार पर नियुक्ति से वंचित किया जा सकता है कि उसने ऑनलाइन आवेदन पत्र के एक कॉलम में अनजाने में गलत योग्यता (डी.एल.एड के स्थान पर बी.एड) चुन ली, जबकि उसी फॉर्म के अन्य हिस्सों में सही योग्यता स्पष्ट रूप से दर्शाई और दस्तावेजों से प्रमाणित की गई है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसी गलती तुच्छ है, इसमें न तो कोई दमन है और न ही मिथ्याप्रस्तुति, तथा इसका चयन प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। याचिकाकर्ता को डी.एल.एड अभ्यर्थी मानते हुए उसके प्राप्तांकों के आधार पर नियुक्ति हेतु विचार किया जाना चाहिए। - प्रश्न: क्या विज्ञापन की शर्तों का कड़ाई से पालन, हर स्थिति में, अभ्यर्थी की सारभूत पात्रता और प्रदर्शन पर हावी हो जाना चाहिए, भले ही गलती मामूली और तकनीकी हो?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि जहाँ सामान्यतः पात्रता नियमों का कड़ाई से अनुपालन आवश्यक है, वहीं न्यायालयों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए जहाँ तकनीकी आधार पर बहिष्करण अनुचित या मनमाना हो। ऐसी छोटी तकनीकी गलतियाँ, जो न पात्रता और न ही मेधा को प्रभावित करती हों, उन्हें अन्याय का कारण नहीं बनने दिया जा सकता। - प्रश्न: क्या भर्ती प्रक्रिया पूर्ण हो जाने के बाद, चयनित सूची से छेड़छाड़ किए बिना भी सुधार या राहत दी जा सकती है?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति उपलब्ध रिक्तियों, जिसमें आगे बढ़ाई गई रिक्तियाँ भी शामिल हैं, के विरुद्ध की जाए, बिना पूर्ववर्ती मेधा सूची को प्रभावित किए, तथा उसे उसके वर्ग में ज्येष्ठता सूची में अंतिम स्थान दिया जाए, बिना किसी पूर्वकालिक वित्तीय लाभ के।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रमुख मामले
- Tamil Nadu & Ors. v. G. Hemalathaa & Anr., (2020) 19 SCC 430
- State of Gujarat & Ors. v. Arvind Kumar T. T. Tiwary, (2012) 9 SCC 545
- T. Jaikumar v. A. Gopu & Anr., (2008) 9 SCC 403
- Kendriya Vidyalaya Sangathan v. Geetanjali Yadav, 2025 SCC Online Del 6420
- Dolly Chhanda v. Chairman, JEE, (2005) 9 SCC 779
- Vashist Narayan Kumar v. State of Bihar & Ors., 2024 LiveLaw (SC) 1
- Collector, Land Acquisition, Anantnag v. Mst. Katiji, AIR 1987 SC 1353
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 7777 of 2024
मामले का शीर्षक: Khusboo Kumari @ Khushboo Kumari v. State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2026 (1) PLJR 45
न्यायालय: हाई कोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट पटना
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार
निर्णय की तिथि: 24-11-2025
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता: श्री S.B.K. Mangalam, अधिवक्ता; श्री Avinash Kumar, अधिवक्ता; श्री Vikash Kumar Singh, अधिवक्ता; श्री Kumar Gaurav, अधिवक्ता; श्री Rishi Raj, अधिवक्ता
राज्य (प्रतिवादी) की ओर से अधिवक्ता: श्री Prateek Kumar, AC to GA-11
बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से अधिवक्ता: श्री Zaki Haider, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका (सिविल), जिसमें ऑनलाइन आवेदन पत्र में कथित त्रुटि के कारण शिक्षक नियुक्ति में उम्मीदवारी पर विचार न किए जाने को चुनौती दी गई
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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