पटना उच्च न्यायालय (2022): दो महिलाओं के बीच उत्तराधिकार विवाद में असली पत्नी का दावा साबित — अदालत ने वैध विवाह को स्वीकार किया

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण पारिवारिक विवाद का निपटारा करते हुए यह तय किया कि एक ही व्यक्ति की “पत्नी” होने का दावा करने वाली दो महिलाओं में से कौन उसकी कानूनी पत्नी और वैध उत्तराधिकारी है। यह फैसला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) से जुड़े विवाद में आया, जिसमें दोनों पक्ष सरकारी कर्मचारी के लापता होने के बाद उसकी संपत्ति और सेवा लाभों पर अधिकार जता रही थीं।

यह मामला बरह उपकारागार (पटना) में कार्यरत एक सरकारी कर्मचारी से जुड़ा था जो 20 जुलाई 1995 से लापता था। सात वर्ष बाद, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के अनुसार, उसे मृत माना गया। इसके बाद दो महिलाओं ने आगे आकर दावा किया कि वे उसकी विधिवत विवाहित पत्नियाँ हैं और उसकी मृत्यु के बाद मिलने वाले वेतन, पेंशन और अन्य लाभों की कानूनी उत्तराधिकारी हैं।

दोनों ने पटना जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) के लिए अलग-अलग वाद दायर किए। निचली अदालत ने साक्ष्य और दस्तावेजों की जांच के बाद वर्ष 2009 में एक महिला का दावा स्वीकार किया और दूसरी की याचिका खारिज कर दी। हारने वाली महिला ने पटना उच्च न्यायालय में Miscellaneous Appeal No. 190 of 2010 और Miscellaneous Appeal No. 215 of 2012 दायर किए।

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने दोनों अपीलों को एक साथ सुनकर 16 दिसंबर 2022 को फैसला सुनाया और निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि दूसरी महिला (प्रतिवादी) ही कर्मचारी की वैध पत्नी थी और उसी को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र पाने का अधिकार है।

मामले की पृष्ठभूमि

पहली महिला (अपीलकर्ता) ने कहा कि उसकी शादी उक्त कर्मचारी से 7 जून 1985 को हुई थी और 1988 में उनकी एक पुत्री हुई। उसने यह भी दावा किया कि वह अपने पति के साथ पटना में रहती थी और उसके लापता होने के बाद उसे ₹27,000 की एक्स-ग्रेशिया सहायता राशि भी मिली थी।

दूसरी महिला (प्रतिवादी) ने यह कहा कि उसकी शादी उसी व्यक्ति से 17 मई 1987 को हुई थी और उनका एक बेटा 1988 में हुआ। उसने अपने दावे के समर्थन में कई दस्तावेज दिए — जैसे लगनपत्री (विवाह प्रमाण), शादी की तस्वीरें, संयुक्त बैंक पासबुक, संपत्ति के कागज़ात और मृतक की मां का हलफनामा, जिसमें उसे पुत्रवधू के रूप में स्वीकार किया गया था।

दोनों के वाद — Succession Case No. 115 of 2002 (अपीलकर्ता द्वारा) और Succession Case No. 123 of 2002 (प्रतिवादी द्वारा) — एक साथ सुने गए।

निचली अदालत का निर्णय

साक्ष्य और दस्तावेजों की जांच के बाद निचली अदालत ने निम्न निष्कर्ष दिए —

  • पहली महिला (अपीलकर्ता) अपने विवाह का कोई प्रमाणिक दस्तावेज या फोटो प्रस्तुत नहीं कर सकी।
  • उसने जिन दस्तावेजों का सहारा लिया, वे सभी 1995 के बाद तैयार किए गए थे, इसलिए उनकी विश्वसनीयता कम थी।
  • दूसरी ओर, दूसरी महिला (प्रतिवादी) ने कई ऐसे दस्तावेज दिए जो विवाह के समय के थे — जैसे लगनपत्री, संयुक्त बैंक खाता, संपत्ति का दस्तावेज, और सास का हलफनामा।
  • यहां तक कि लापता व्यक्ति ने खुद अपने ससुर के खिलाफ बिहटा थाना कांड संख्या 197/1991 दर्ज कराया था, जिसमें उसने उन्हें “ससुर” कहा था — यह इस बात का मजबूत प्रमाण था कि दूसरी महिला ही उसकी पत्नी थी।

इस आधार पर अदालत ने निर्णय दिया कि दूसरी महिला वैध पत्नी है और उसी को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र दिया जाएगा।


उच्च न्यायालय में अपील

पहली महिला (अपीलकर्ता) ने कहा कि उसे सर्विस बुक, बेटी के स्कूल प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज पेश करने का मौका नहीं मिला, जिनसे साबित होता कि मृतक उसके पति थे। उसने यह भी कहा कि उसके वकील की लापरवाही से ये दस्तावेज पहले दाखिल नहीं हो सके, इसलिए अब उन्हें अपील में स्वीकार किया जाए।

वहीं दूसरी महिला (प्रतिवादी) ने इसका विरोध किया। उसने कहा कि ये दस्तावेज बाद में बनाए गए हैं, और इनके हस्ताक्षर अंग्रेजी में हैं जबकि मृतक हमेशा हिंदी में हस्ताक्षर करता था। साथ ही, स्कूल प्रमाणपत्र पर मुंगेर का पता लिखा था, जबकि अपीलकर्ता ने कहा था कि वे पटना में रहते थे।

न्यायालय की विवेचना और निर्णय

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी। उन्होंने कहा —

  • अपीलकर्ता ने अपने उत्तराधिकार वाद में मृतक की मां का नाम शामिल नहीं किया, जबकि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372(c) के तहत यह आवश्यक है।
  • अपीलकर्ता के पास विवाह का कोई ठोस प्रमाण नहीं था।
  • जो दस्तावेज उसने अपील में नए साक्ष्य के रूप में देना चाहा, वे 20 साल बाद बनाए गए थे, इसलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि वकील की गलती या लापरवाही को “पर्याप्त कारण” नहीं माना जा सकता।
इसके लिए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला दिया —

  • Union of India v. Ibrahim Uddin (2012) 8 SCC 148
  • A. Andisamy Chettiar v. A. Subburaj Chettiar (2015) 17 SCC 713

इन दोनों में कहा गया था कि अपील में नया साक्ष्य तभी स्वीकार किया जा सकता है जब वह “न्याय के लिए अत्यावश्यक” हो।

दूसरी ओर, प्रतिवादी ने लगातार एक जैसी बातें कहीं और उसके दस्तावेज 1995 से पहले के थे। उसकी शादी के फोटो, लगनपत्री, बैंक पासबुक, संपत्ति के कागज़ और सास का हलफनामा सभी प्रमाणिक थे।

इसलिए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा और कहा कि दूसरी महिला ही मृतक की विधिवत पत्नी है

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह फैसला उत्तराधिकार विवादों में एक अहम मार्गदर्शन देता है।

  • अदालत ने कहा कि केवल मौखिक बयान या बाद में बने कागज़ात पर्याप्त नहीं हैं, विवाह या वैध रिश्ते को साबित करने के लिए समयानुकूल दस्तावेजी प्रमाण जरूरी है।
  • उत्तराधिकार अधिनियम के तहत सभी निकट संबंधियों को शामिल करना अनिवार्य है, अन्यथा याचिका तकनीकी रूप से दोषपूर्ण मानी जाएगी।
  • अपील में नया साक्ष्य केवल तभी लिया जा सकता है जब वह बिल्कुल आवश्यक हो, न कि तब जब कोई पक्ष पहले सबूत देना भूल गया हो।
  • यदि किसी व्यक्ति को पहले कुछ सरकारी लाभ मिल भी जाएं, तो वह स्वतः वैध उत्तराधिकारी नहीं बन जाता जब तक कि कानूनी प्रमाण मौजूद न हो।

यह फैसला परिवारिक और उत्तराधिकार कानून में पारदर्शिता और प्रमाणिकता की आवश्यकता को मजबूत करता है।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय की राय

  • क्या अपीलकर्ता मृतक की वैध पत्नी थी?
    ✘ नहीं। उसने विवाह का कोई प्रमाण नहीं दिया।
  • क्या अपील में नया साक्ष्य स्वीकार किया जा सकता था?
    ✘ नहीं। देर से या वकील की गलती से यह औचित्यपूर्ण नहीं है।
  • क्या प्रतिवादी ने वैध विवाह सिद्ध किया?
    ✔ हाँ। उसने दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य से विवाह साबित किया।

संदर्भित निर्णय

  • Union of India v. Ibrahim Uddin, (2012) 8 SCC 148
  • A. Andisamy Chettiar v. A. Subburaj Chettiar, (2015) 17 SCC 713
  • K.P. Narayana Reddy v. Alla Nagi Reddy, AIR 1996 AP 198

मामले का शीर्षक

Appellant v. The Estate of Late Shankar Sharan Singh & Others (नाम गोपनीय रखे गए)

केस नंबर

Miscellaneous Appeal Nos. 190 of 2010 and 215 of 2012

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 404

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • अपीलकर्ता की ओर से: श्रीमती निवेदिता निर्वाकर, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री सुरेश कुमार ईश्वर; श्री अनिल कुमार तिवारी; सुश्री ऋचा
  • प्रतिवादी की ओर से: श्री अजय कुमार शर्मा

निर्णय का लिंक

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