पटना उच्च न्यायालय का फैसला: केवल शक के आधार पर हत्या का दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 29 नवम्बर 2022 को एक महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए चार आरोपियों की बरी (acquittal) को बरकरार रखा, जिन्हें निचली अदालत ने हत्या और अपहरण के आरोपों से बरी कर दिया था। यह अपील मृतक के भाई (सूचना देने वाले) द्वारा दायर की गई थी, जो निचली अदालत के निर्णय से असंतुष्ट था।

यह मामला पटना जिले के खुसरूपुर थाना कांड संख्या 102/2007 से संबंधित था। सूचना देने वाले सुग्रीव महतो ने 24 अक्टूबर 2007 को पुलिस में लिखित रिपोर्ट दी थी कि उसका छोटा भाई (मृतक) गांव के ही एक व्यक्ति, राम नंदन महतो, के साथ मछली और रोटी खाने गया था। उसके साथ अन्य लोग — सुरेश पासवान, राम सकल पासवान और कृष्णा महतो — भी थे। सूचना देने वाले ने बताया कि उसने अपने भाई को इन सभी के साथ सामुदायिक भवन के पास झोपड़ी में शराब पीते और भोजन करते देखा।

रात में मृतक घर नहीं लौटा। परिवार के लोग उसकी तलाश में निकले तो पास के खेत में फसल कुचली हुई मिली और मृतक का गमछा (तौलिया) पड़ा मिला। इस पर संदेह हुआ कि उसका भाई अगवा या मारा गया है।

मामला धारा 364/34 आईपीसी (अपहरण और सामूहिक इरादा) के तहत दर्ज किया गया। जांच के दौरान मृतक का शव बरामद हुआ और पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ हत्या (धारा 302/34) और अपहरण का आरोपपत्र (charge sheet) दाखिल किया।

मामला सत्र न्यायालय में चला जहाँ आठ गवाह पेश हुए, जिनमें स्वयं सुग्रीव महतो भी शामिल थे। लेकिन अदालत ने पाया कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) पर आधारित है और कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है।

निचली अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध निर्णय Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra (AIR 1984 SC 1622) का हवाला दिया, जिसमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर सजा देने के “पाँच स्वर्णिम सिद्धांत” (five golden principles) बताए गए हैं। अदालत ने कहा कि इस मामले में साक्ष्यों की श्रृंखला (chain of circumstances) अधूरी है और दोष सिद्ध करने के लिए आवश्यक मानक पूरे नहीं हुए। इसलिए आरोपियों को संदेह का लाभ (benefit of doubt) दिया गया।

सूचना देने वाले ने इस फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय में अपील दायर की और कहा कि निचली अदालत ने यह अनदेखा किया कि मृतक को आखिरी बार इन्हीं आरोपियों के साथ देखा गया था, इसलिए उन्हें यह बताना चाहिए था कि उसके बाद क्या हुआ।

राज्य की ओर से अपर लोक अभियोजक (APP) श्री अभिमन्यु शर्मा ने कहा कि साक्ष्य में कोई ठोस बात नहीं है जो आरोपियों को अपराध से जोड़ सके, और निचली अदालत ने सही निर्णय दिया था।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत का निर्णय पूरी तरह तार्किक और साक्ष्यों पर आधारित है। अदालत ने कहा:

  • पूरा मामला “आखिरी बार साथ देखे जाने” (last seen together) की धारणा पर टिका था। लेकिन गवाहों ने कहा कि मृतक और आरोपी शराब पीने और भोजन करने के बाद अलग-अलग दिशा में गए, और उनके बीच 10 से 20 मिनट का अंतराल था। यह अंतराल परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला को तोड़ देता है।
  • गवाहों ने कहा कि उन्होंने आरोपियों को हथियारों के साथ खेत में देखा, लेकिन यह तथ्य एफआईआर में नहीं लिखा गया था। अदालत ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण तथ्य था, जिसे न लिखना अभियोजन की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है।
  • कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो कि इन्हीं आरोपियों ने हत्या की। न तो कोई हथियार बरामद हुआ, न ही कोई ठोस कारण (motive) सामने आया।

अदालत ने कहा कि केवल शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक मामलों में अभियोजन (prosecution) को यह सिद्ध करना होता है कि अपराध के प्रत्येक कड़ी का संबंध आरोपी से है और कोई अन्य संभावना नहीं बचती। इस मामले में ऐसी स्थिति नहीं बनी।

अंततः उच्च न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी करने के निर्णय को सही ठहराया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के उस मूल सिद्धांत को दोहराता है कि “शक, चाहे कितना भी गहरा हो, प्रमाण नहीं माना जा सकता।”

इससे स्पष्ट संदेश जाता है कि जब मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हो, तो हर कड़ी का प्रमाणित होना आवश्यक है। यदि साक्ष्य में कोई कमी रह जाती है, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाएगा।

जांच एजेंसियों के लिए यह निर्णय चेतावनी है कि हर छोटे विवरण — जैसे गवाहों की संगति, समय का अंतर, और एफआईआर में तथ्यों का उल्लेख — अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। यदि ये बातें अस्पष्ट रहेंगी, तो गंभीर अपराधों में भी दोष सिद्ध करना कठिन होगा।

आम जनता के लिए यह फैसला यह दिखाता है कि न्यायालय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं बल्कि न्याय करना है। यदि अभियोजन अपने कर्तव्य में असफल रहता है, तो अदालत निर्दोष व्यक्ति को दंडित नहीं करेगी।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या अभियोजन पक्ष यह सिद्ध कर सका कि सभी परिस्थितियाँ आरोपियों के खिलाफ पूर्ण रूप से जुड़ी हुई हैं?
    ✔ नहीं। मृतक और आरोपियों के साथ दिखने के अलावा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला।
  • क्या एफआईआर में महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख न होना अभियोजन के लिए हानिकारक रहा?
    ✔ हाँ। हथियार देखने जैसे तथ्य का न होना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है।
  • क्या केवल शक के आधार पर सजा दी जा सकती है?
    ✔ नहीं। अदालत ने दोहराया कि शक प्रमाण नहीं होता।
  • अंतिम निर्णय: अपील खारिज, चारों आरोपी बरी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra, AIR 1984 SC 1622

मामले का शीर्षक
Sugreev Mahto v. State of Bihar & Ors.

केस नंबर
Criminal Appeal (DB) No. 1503 of 2019

उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 255

न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह
माननीय श्री न्यायमूर्ति खातिम रेज़ा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
अपीलकर्ता की ओर से: श्री संजय कुमार, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री अभिमन्यु शर्मा, ए.पी.पी.

निर्णय की तिथि
29 नवम्बर 2022

निर्णय का लिंक
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