पटना हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संरक्षण आदेशों की सीमाएँ (2025)

1. निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act – DV Act) के अंतर्गत दिए जाने वाले संरक्षण आदेशों (Protection Orders) की सीमा को लेकर था। विशेष रूप से, यह सवाल था कि क्या कोई मजिस्ट्रेट किसी पति/प्रतिवादी को “अपने किसी भी संयुक्त या अलग संपत्ति को बेचने या ट्रांसफर करने से रोक सकता है?”

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीड़ित महिला (अभियोगी) ने वर्ष 2008 में घरेलू हिंसा का मामला दायर किया। इसमें उसने संरक्षण आदेश (Section 18) और आवास संबंधी राहत (Section 19) की मांग की। 05.06.2009 को मजिस्ट्रेट ने एक अंतरिम आदेश पारित किया जिसमें पति को “अपनी किसी भी संयुक्त या अलग संपत्ति को किसी भी तरह ट्रांसफर न करने” का निर्देश दिया गया।

यह आदेश बहुत व्यापक था—इसमें यह नहीं बताया गया कि कौन-सी संपत्ति पीड़ित महिला के उपयोग में थी, कौन-सी संयुक्त थी, या कौन-सी पति की व्यक्तिगत संपत्ति थी। इसके बाद 10.08.2010 को मजिस्ट्रेट ने एक और आदेश पारित किया जिसमें पति को दो बातें करने को कहा गया:

  1. एक हलफनामा दें कि उसने अभी तक कोई संपत्ति ट्रांसफर नहीं की है;
  2. एक और हलफनामा दें कि वह भविष्य में भी अपनी किसी भी संपत्ति को ट्रांसफर नहीं करेगा।

साथ ही, चेतावनी दी गई कि आदेश का उल्लंघन करने पर DV Act की धारा 31 के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।

पति ने इस आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण दायर किया, लेकिन 24.02.2015 को पुनरीक्षण अदालत ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश को सही माना। मजबूर होकर पति ने पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

हाई कोर्ट में पति का तर्क था:

  • मजिस्ट्रेट ने अपनी शक्ति का अत्यधिक उपयोग किया।
  • किसी भी “संपत्ति” पर रोक लगाने वाला आदेश धारा 18 के अनुरूप नहीं है।
  • इससे उन तीसरे व्यक्तियों के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं जो उस संपत्ति में हिस्सेदार हैं।
  • आदेश अस्पष्ट, अत्यधिक व्यापक और कानून की मंशा के विरुद्ध है।

पीड़ित महिला का तर्क था:

  • पति उसे घर में रहने नहीं दे रहा है।
  • पति ने भरण-पोषण भी नहीं दिया, जिससे बकाया राशि काफी बढ़ चुकी है।

हाई कोर्ट ने धारा 18 DV Act का अध्ययन किया और पाया कि यह धारा केवल उन्हीं संपत्तियों पर रोक लगाने की अनुमति देती है जो—

  • पीड़ित महिला और प्रतिवादी द्वारा संयुक्त रूप से उपयोग/धारण की जाती हों;
  • या जिन्हें प्रतिवादी अकेले उपयोग या धारण करता हो;
  • या जो shared household (साझा घरेलू घर) की श्रेणी में आती हों।

अदालत ने कहा कि—

  • मजिस्ट्रेट ने बिना यह जांचे कि कौन-सी संपत्ति साझा है और कौन-सी नहीं, एक व्यापक प्रतिबंध लगा दिया।
  • “किसी भी” संपत्ति को ट्रांसफर न करने का निर्देश अस्पष्ट था और तीसरे पक्षों के अधिकारों को भी प्रभावित कर सकता था।
  • पुनरीक्षण अदालत ने भी इस त्रुटि को ठीक नहीं किया।

इसलिए, हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश (10.08.2010) और पुनरीक्षण आदेश (24.02.2015) दोनों को रद्द कर दिया।

लेकिन अदालत ने एक महत्वपूर्ण बात भी स्पष्ट की:

  • पीड़ित महिला का shared household में रहने का अधिकार तथा
  • उसका भरण-पोषण पाने का अधिकार

इस निर्णय से प्रभावित नहीं होंगे। वह चाहे तो धारा 18 और 19 के तहत नई याचिका दायर कर सकती है और उन संपत्तियों के संबंध में राहत मांग सकती है जिनमें वास्तव में उसका साझा अधिकार या संबंध हो।

यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि DV Act के तहत राहतें दी जाएँ, लेकिन कानून की सीमा से बाहर जाकर किसी भी व्यक्ति के अधिकारों पर अनावश्यक रोक न लगे।

2. निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण है—

  1. संपत्ति पर रोक के आदेशों की सीमा स्पष्ट हुई।
    अब यह स्पष्ट है कि DV Act के तहत आदेश केवल उन्हीं संपत्तियों पर लग सकते हैं जो पीड़ित महिला से संबंधित हों या जिन्हें पति व्यक्तिगत रूप से रखता हो। इससे अति-विस्तृत आदेशों की संभावना कम हो जाएगी।
  2. तीसरे पक्षों के अधिकार सुरक्षित हुए।
    संयुक्त परिवार की संपत्ति पर बिना जांच-परख के रोक लगाने से कई बार अन्य परिवार के सदस्यों के अधिकार प्रभावित हो जाते थे। अब अदालतों को सावधानी बरतनी होगी।
  3. DV Act को प्रभावी और संतुलित रखने में मदद।
    यह अधिनियम महिलाओं को त्वरित राहत देने के लिए है, परंतु यदि आदेश अत्यधिक व्यापक हों, तो वे स्वयं अवैध हो जाते हैं। यह निर्णय कानून की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।
  4. महिलाओं के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा।
    अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला का रहने का अधिकार व भरण-पोषण का अधिकार इस निर्णय से प्रभावित नहीं होगा। यानी महिलाओं की मुख्य सुरक्षा कायम रहती है।
  5. निम्न अदालतों के लिए दिशानिर्देश।
    यह निर्णय मजिस्ट्रेटों को बताता है कि उन्हें संपत्ति की प्रकृति, उपयोग और स्वामित्व की जांच के बाद ही किसी प्रकार की रोक लगानी चाहिए।

3. कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या मजिस्ट्रेट धारा 18 के तहत किसी प्रतिवादी को उसकी “किसी भी” संपत्ति को ट्रांसफर करने से रोक सकता है?
    • निर्णय: नहीं। आदेश केवल उन संपत्तियों पर लागू हो सकता है जो धारा 18 के दायरे में आती हों।
  • क्या अस्पष्ट और व्यापक आदेश पर आधारित हलफनामा देने का निर्देश वैध है?
    • निर्णय: नहीं। यदि मूल आदेश ही दुर्बल है, तो उसके आधार पर जारी सभी आदेश स्वतः अवैध हो जाते हैं।
  • क्या आदेश रद्द होने से महिला का shared household या maintenance का अधिकार समाप्त हो जाएगा?
    • निर्णय: नहीं। ये अधिकार बरकरार रहेंगे।
  • क्या महिला नई याचिका दायर कर सकती है?
    • निर्णय: हाँ, वह धारा 18 और 19 के तहत नई और स्पष्ट मांगें कर सकती है।

6. मामले का शीर्षक

Shailendra Kumar Singh v. State of Bihar & Anr.

7. केस नंबर

Criminal Miscellaneous No. 43609 of 2015
(Arising out of Domestic Violence Case No. 03 of 2008)

8. उद्धरण (Citation)

2025 (2) PLJR 308

9. न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति शैलेंद्र सिंह

10. वकीलों के नाम और पक्षकार

  • श्री पंतजलि ऋषि — याचिकाकर्ता की ओर से
  • सुश्री प्रेर्णा ऋषि — याचिकाकर्ता की ओर से
  • श्री देशंकर पांडे — पीड़ित महिला (ओपी No. 2) की ओर से
  • श्री बिनोद कुमार नं. 3, एपीपी — राज्य की ओर से

11. निर्णय का लिंक

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