पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी डॉक्टर या अस्पताल के खिलाफ बिना विशेषज्ञ राय या प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) के आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। यह निर्णय एक ऐसे मामले में दिया गया जिसमें एक निजी अस्पताल, Paras Global Hospital (दरभंगा), पर उपचार में लापरवाही के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई थी। न्यायालय ने माना कि ऐसी एफआईआर न तो विधिसम्मत है और न ही यह किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) को दर्शाती है।
निर्णय की सरल व्याख्या
यह मामला Paras Global Hospital, Darbhanga से जुड़ा था, जिसके यूनिट हेड अशिष मुखर्जी की ओर से एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में लहेरियासराय थाना कांड संख्या 579/2018 को रद्द करने की मांग की गई। इस मामले में अस्पताल के खिलाफ धारा 304ए, 420 और 34 भारतीय दंड संहिता के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
एफआईआर में आरोप लगाया गया कि एक व्यक्ति जितेन्द्र कुमार सड़क दुर्घटना में घायल हुए और उन्हें दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (DMCH) से Paras Global Hospital भेजा गया। आरोप था कि अस्पताल ने उपचार में लापरवाही की, रोगी के रिश्तेदारों से ₹72,000 यह कहकर लिए कि वह ठीक हो जाएगा, परंतु उसे बाद में पटना के Paras HMRI Hospital भेजा गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।
अस्पताल की ओर से कहा गया कि आरोप पूरी तरह अस्पष्ट हैं और किसी भी तरह से अपराध का खुलासा नहीं करते। उन्होंने यह बताया कि मरीज को गंभीर हालत में भर्ती किया गया था, वेंटिलेटर पर रखा गया और उसकी स्थिति के बारे में परिजनों को विस्तार से बताया गया। अस्पताल के रिकॉर्ड (Annexure 2) से स्पष्ट था कि रोगी की हालत पहले से ही बहुत गंभीर थी।
अस्पताल ने यह भी बताया कि जब मरीज को पटना भेजा गया, तब उसके परिजन अस्पताल कर्मियों से झगड़ा करने लगे और संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। इसके लिए अस्पताल ने भी लहेरियासराय थाना कांड संख्या 580/2018 दर्ज कराया था।
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों — Jacob Mathew v. State of Punjab (2005), A.S.V. Narayanan Rao v. Ratnamala (2013), और Lalita Kumari v. Government of U.P. (2014) — पर भरोसा किया और कहा कि किसी चिकित्सक या अस्पताल के खिलाफ आपराधिक मामला तभी दर्ज हो सकता है जब:
- पुलिस पहले प्रारंभिक जांच करे,
- किसी स्वतंत्र सरकारी चिकित्सक से विशेषज्ञ राय ली जाए, और
- यह राय स्पष्ट रूप से दर्शाए कि चिकित्सक की लापरवाही “गंभीर” (gross negligence) थी।
राज्य की ओर से उपस्थित वकील ने याचिका का विरोध किया, लेकिन कोई ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे साबित हो कि जांच अधिकारी ने किसी विशेषज्ञ राय ली हो या कोई ठोस प्रमाण पाया हो।
न्यायालय की टिप्पणी और विचार
माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि एफआईआर में कोई ठोस या विशिष्ट आरोप नहीं है। न तो किसी विशेषज्ञ राय का उल्लेख किया गया और न ही ऐसा कोई दस्तावेज है जिससे यह साबित हो कि अस्पताल ने उपचार में लापरवाही की।
अदालत ने पाया कि मरीज को 28 नवंबर 2018 को भर्ती किया गया था। उसे सिर और कान में चोटें थीं, बेहोशी और उल्टी की शिकायत थी। अस्पताल ने तुरंत इलाज शुरू किया, वेंटिलेटर सपोर्ट दिया और उसी दिन शाम को उसे बेहतर इलाज के लिए पटना भेज दिया। परिजनों को मरीज की गंभीर स्थिति के बारे में पहले ही बता दिया गया था।
अदालत ने कहा कि पुलिस ने बिना जांच किए “जल्दबाजी” में एफआईआर दर्ज कर ली। Lalita Kumari मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि “चिकित्सीय लापरवाही (medical negligence)” जैसे मामलों में पुलिस को पहले प्रारंभिक जांच करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वास्तव में कोई संज्ञेय अपराध हुआ है या नहीं।
न्यायालय ने Jacob Mathew निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि —
- आपराधिक लापरवाही साबित करने के लिए केवल सामान्य चूक (ordinary negligence) नहीं, बल्कि “गंभीर लापरवाही” (gross negligence) होनी चाहिए।
- चिकित्सक को तब ही दंडनीय माना जा सकता है जब वह ऐसा कुछ करे जो कोई भी समझदार चिकित्सक न करता।
- बिना “mens rea” या जानबूझकर की गई लापरवाही के, चिकित्सक पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने कहा कि यह मामला केवल सिविल लापरवाही का हो सकता है, आपराधिक नहीं। एफआईआर में ऐसा कोई तत्व नहीं था जिससे यह कहा जा सके कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय चिकित्सकों और अस्पतालों के लिए एक बड़ी राहत है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यदि किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो केवल उस आधार पर डॉक्टर या अस्पताल को आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चिकित्सा सेवा में सफलता या असफलता अनेक परिस्थितियों पर निर्भर करती है; इसे अपराध नहीं माना जा सकता जब तक कि गंभीर लापरवाही साबित न हो।
आम जनता के लिए यह निर्णय यह संदेश देता है कि यदि वास्तविक लापरवाही है, तो उसके लिए नागरिक न्यायालय या चिकित्सा परिषद (Medical Council) के माध्यम से उपाय मौजूद हैं, लेकिन आपराधिक मुकदमा तभी संभव है जब अपराध की गंभीरता और जानबूझकर की गई गलती साबित हो।
पुलिस विभाग के लिए यह निर्णय एक दिशा-निर्देश है कि —
- चिकित्सीय लापरवाही के आरोपों में पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य है,
- विशेषज्ञ राय लेना आवश्यक है, और
- बिना इन प्रक्रियाओं के आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय चिकित्सा जगत और कानून दोनों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या चिकित्सीय लापरवाही के आरोप में बिना प्रारंभिक जांच या विशेषज्ञ राय के एफआईआर दर्ज की जा सकती है?
निर्णय: नहीं। अदालत ने कहा कि ऐसी एफआईआर अवैध है और इसे रद्द किया गया। - क्या एफआईआर में दर्ज तथ्य धारा 304ए या 420 के तहत संज्ञेय अपराध को दर्शाते हैं?
निर्णय: नहीं। आरोप अस्पष्ट थे और चिकित्सा साक्ष्य से समर्थित नहीं थे। - क्या पुलिस ने विधिसम्मत कार्य किया?
निर्णय: नहीं। पुलिस ने जल्दबाजी में कार्य किया और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Jacob Mathew v. State of Punjab (2005) 6 SCC 1
- Lalita Kumari v. Government of U.P. (2014) 2 SCC 1
- A.S.V. Narayanan Rao v. Ratnamala (2013) 10 SCC 741
- State of Haryana v. Bhajan Lal AIR 1992 SC 604
- Vineet Kumar v. State of U.P. (2017) 13 SCC 369
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Jacob Mathew v. State of Punjab
- Lalita Kumari v. Government of U.P.
- Bhajan Lal Case
मामले का शीर्षक
Paras Global Hospital v. The State of Bihar & Ors.
केस नंबर (in English)
Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1688 of 2019
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 177
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
याचिकाकर्ता की ओर से: सुश्री अर्चना सिन्हा, श्री आलोक कुमार @ आलोक कृष्ण शाही
प्रतिवादी राज्य की ओर से: सुश्री दिव्या वर्मा, ए.सी. टू ए.ए.जी.-3
निर्णय का लिंक
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