निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने लेटर पेटेंट अपील संख्या 1659/2019 में एक अहम फैसला दिया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि यदि कोई व्यक्ति बैंक के कैंटीन में काम करता है, तो उसे स्वतः बैंक का नियमित कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
यह मामला एक व्यक्ति से जुड़ा था जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की अरवल शाखा में काम करता था और दावा करता था कि वह बैंक में बतौर मैसेंजर (दूत) कार्यरत था। उसका कहना था कि उसने 240 दिनों से अधिक काम किया था और उसके बाद बिना कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया। इसलिए उसने पुनः नियुक्ति (reinstatement) और नियमितीकरण (regularization) की मांग की थी।
शुरुआत में उसने पटना उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें एकल न्यायाधीश ने बैंक को निर्देश दिया था कि वह उसके मामले पर विचार करे और उसे बैंक के 06.04.1991 के परिपत्र (circular) के अनुसार समायोजित करने की संभावना देखे।
लेकिन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने इस आदेश को चुनौती दी। अपीलीय पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में कर्मचारी को औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal) या श्रम न्यायालय (Labour Court) का सहारा लेना चाहिए, न कि सीधे उच्च न्यायालय का। इसीलिए मामला श्रम न्यायालय को भेजा गया ताकि यह तय किया जा सके कि कर्मचारी की सेवाओं को समाप्त करना उचित था या नहीं।
श्रम न्यायालय के समक्ष अपीलकर्ता (कर्मी) ने स्वयं गवाही दी, जबकि बैंक की ओर से दो गवाह प्रस्तुत किए गए। सबूतों की जांच के बाद श्रम न्यायालय ने पाया कि कर्मचारी वास्तव में बैंक के “कैंटीन कमेटी” द्वारा नियुक्त किया गया था, न कि बैंक के नियमित स्टाफ के रूप में।
यह कैंटीन स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों की सुविधा के लिए संचालित की जाती थी और यह बैंक के विधिक (statutory) या संविदात्मक (contractual) दायित्व के अंतर्गत नहीं आती थी।
श्रम न्यायालय ने State Bank of India & Ors. v. State Bank of India Canteen Employees Union (Bengal Circle), (2000) 5 SCC 531 नामक सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भरोसा किया। उसमें कहा गया था कि कैंटीन कमेटी द्वारा नियुक्त कर्मचारी बैंक के कर्मचारी नहीं माने जा सकते, क्योंकि बैंक पर ऐसे कैंटीन चलाने या उनके कर्मचारियों को स्थायी करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है।
इस मामले में श्रम न्यायालय ने पाया कि कर्मचारी यह साबित नहीं कर सका कि उसे बैंक ने कभी औपचारिक रूप से नियुक्त किया था। जो दस्तावेज उसने दिए, वे केवल —
- एक हाथ से लिखी सूची थी जिसमें मासिक भुगतान का उल्लेख था, और
- एक शाखा प्रबंधक का पत्र था जिसमें उसने मानवीय दृष्टिकोण से उसकी सेवाओं की सराहना की थी और सुझाव दिया था कि भविष्य में उसे नियमित नौकरी दी जाए।
लेकिन इन दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि वह बैंक का कर्मचारी था। इसलिए श्रम न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
कर्मी ने इस निर्णय के खिलाफ फिर से उच्च न्यायालय में एकल न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर की, लेकिन न्यायालय ने पाया कि श्रम न्यायालय का निर्णय पूरी तरह साक्ष्यों पर आधारित था और उसमें कोई त्रुटि नहीं थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तथ्यात्मक मुद्दों पर उचित साक्ष्य मौजूद हों, तब उच्च न्यायालय को श्रम न्यायालय के निर्णय में दखल नहीं देना चाहिए।
फिर कर्मचारी ने लेटर पेटेंट अपील दायर की, जिसे माननीय न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार और माननीय न्यायमूर्ति नवनीत कुमार पांडेय की खंडपीठ ने सुना।
पीठ ने कहा कि यह मामला एक गरीब व्यक्ति का है जो मात्र ₹30 प्रति माह के मानदेय पर काम करता था। न्यायालय ने सहानुभूति तो व्यक्त की, पर यह भी कहा कि सहानुभूति के आधार पर किसी को नियमित सेवा में नहीं लिया जा सकता जब तक कि कानूनी रूप से उसका दावा सिद्ध न हो।
न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता ने कोई नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची या सेवा रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि वह बैंक का नियमित कर्मचारी था। इसलिए उसका दावा निराधार है।
खंडपीठ ने अंततः कहा कि श्रम न्यायालय और एकल न्यायाधीश दोनों के निर्णयों में कोई त्रुटि नहीं है। इसीलिए अपील को निरस्त कर दिया गया, हालांकि कोई जुर्माना या खर्च नहीं लगाया गया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला न केवल इस कर्मचारी के लिए बल्कि ऐसे सभी कामगारों के लिए महत्वपूर्ण है जो किसी सार्वजनिक संस्था या बैंक से जुड़ी कैंटीन, समिति, ठेका या वेलफेयर स्कीम के तहत काम करते हैं।
- रोजगार संबंध की स्पष्टता: केवल किसी सरकारी संस्था के परिसर में काम करने से कोई व्यक्ति उस संस्था का कर्मचारी नहीं बन जाता। उसके लिए स्पष्ट नियुक्ति आदेश या वेतन रिकॉर्ड आवश्यक है।
- कैंटीन कर्मचारियों की स्थिति स्पष्ट: बैंक या सरकारी दफ्तरों में चलने वाली कैंटीनें अक्सर स्थानीय समितियों द्वारा चलाई जाती हैं। उनके कर्मचारियों को संस्था का स्थायी कर्मचारी नहीं माना जाएगा जब तक कोई विधिक नियम या समझौता ऐसा न कहे।
- न्यायालय की सीमाएँ: उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि श्रम न्यायालय ही ऐसे तथ्यों की जांच करने का सही मंच है। उच्च न्यायालय तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब कोई गंभीर कानूनी गलती हो।
- सहानुभूति बनाम कानून: यह निर्णय याद दिलाता है कि अदालतें संवेदनशील जरूर हैं, लेकिन किसी भी फैसले में कानून का पालन सर्वोपरि है। भावनात्मक आधार पर नियमितीकरण नहीं किया जा सकता।
- सरकारी संस्थानों के लिए संदेश: यह फैसला बैंकों और अन्य सरकारी निकायों के लिए भी मार्गदर्शक है कि वे अपने अनुबंधित और कल्याण योजनाओं के कर्मचारियों के साथ स्पष्ट अनुबंध रखें ताकि बाद में भ्रम की स्थिति न बने।
कुल मिलाकर, यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि बिना औपचारिक नियुक्ति के किसी व्यक्ति को सरकारी संस्था का नियमित कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- मुद्दा 1: क्या बैंक की कैंटीन में काम करने वाला व्यक्ति बैंक का कर्मचारी माना जा सकता है?
निर्णय: नहीं। न्यायालय ने कहा कि कैंटीन कमेटी द्वारा नियुक्त व्यक्ति बैंक का कर्मचारी नहीं है। - मुद्दा 2: क्या कर्मचारी को पुनः नियुक्ति या नियमितीकरण का अधिकार है?
निर्णय: नहीं। कोई औपचारिक नियुक्ति या वेतन रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। इसलिए उसका दावा अस्वीकार किया गया। - मुद्दा 3: क्या उच्च न्यायालय को श्रम न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करना चाहिए?
निर्णय: नहीं। श्रम न्यायालय ने सबूतों के आधार पर निर्णय दिया है और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- State Bank of India & Ors. v. State Bank of India Canteen Employees Union (Bengal Circle), (2000) 5 SCC 531
मामले का शीर्षक
Appellant v. State Bank of India & Ors.
केस नंबर
Letters Patent Appeal No. 1659 of 2019
(in Civil Writ Jurisdiction Case No. 19517 of 2019)
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 160
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार
माननीय न्यायमूर्ति नवनीत कुमार पांडेय
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- अपीलकर्ता की ओर से: श्री रघवेंद्र शरण पांडेय, अधिवक्ता
- बैंक की ओर से: श्री बिनोद बिहारी सिन्हा, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक
MyMxNjU5IzIwMTkjMSNO-P3ENiY35–ak1–uk=
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