पटना उच्च न्यायालय ने केवल पोर्टल पर नोटिस अपलोड करने को “प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन” माना – जीएसटी आदेश रद्द (2025)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 2025 में दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया कि जीएसटी विभाग किसी भी करदाता के खिलाफ बिना सही नोटिस और सुनवाई के कोई आदेश पारित नहीं कर सकता।
न्यायालय ने पाया कि कर अधिकारी ने केवल जीएसटी पोर्टल पर नोटिस अपलोड किया था, जिसे करदाता ने देखा ही नहीं, और बाद में सीधे टैक्स वसूली का आदेश पारित कर दिया। इस वजह से अदालत ने पूरा आदेश रद्द कर दिया।

यह मामला एक जीएसटी पंजीकृत व्यापारी (यहाँ “याचिकाकर्ता”) का था, जिसने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की। उसका कहना था कि विभाग ने उसके खिलाफ कर, ब्याज और जुर्माने का आदेश सिर्फ एक टाइपिंग मिस्टेक के कारण पास कर दिया।

याचिकाकर्ता ने बताया कि दिसंबर 2018 की जीएसटीआर-3बी रिटर्न भरते समय गलती से एक अंक “9” ज्यादा लिख दिया गया था, जिससे उस महीने का टर्नओवर गलत दिखा।
लेकिन बाद में जब उसने वार्षिक रिटर्न (GSTR-9) और पुन:मिलान विवरण (GSTR-9C) दाखिल किया, तो सही आंकड़े पहले से ही वहाँ दर्ज थे। इसका मतलब यह था कि कोई कर चोरी या जानबूझकर गलती नहीं हुई थी।

फिर भी, विभाग ने बिना कोई सुनवाई दिए, 24 अप्रैल 2024 को आदेश पारित कर दिया और उसी दिन Form DRC-07 में उसका सारांश भी जारी कर दिया। इसके बाद वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी गई।

याचिकाकर्ता का कहना था कि:

  • नोटिस और रिमाइंडर केवल जीएसटी पोर्टल पर अपलोड किए गए थे;
  • किसी भी ई-मेल या डाक द्वारा सूचना नहीं दी गई;
  • इसलिए उसे पता ही नहीं चला कि कोई नोटिस जारी हुआ है;
  • जब तक उसे जानकारी मिली, तब तक अंतिम आदेश पारित हो चुका था।

राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि करदाता के पास वैकल्पिक उपाय (Appeal) उपलब्ध है, इसलिए उसे पहले अपील करनी चाहिए थी। लेकिन उच्च न्यायालय ने कहा कि जब मूलभूत न्यायसंगत प्रक्रिया (Natural Justice) का ही उल्लंघन हो गया है, तब अपील का रास्ता बताना उचित नहीं होगा।

न्यायालय ने पाया कि:

  • पूरा नोटिस केवल पोर्टल पर डाला गया;
  • करदाता को उसकी जानकारी नहीं दी गई;
  • यह उम्मीद करना कि हर व्यक्ति रोजाना पोर्टल चेक करे, व्यावहारिक नहीं है।

इसलिए, कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पोर्टल पर अपलोड करना “सेवा” (service of notice) नहीं माना जा सकता।
ऐसा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल इसी आधार पर पूरा आदेश रद्द किया जा सकता है क्योंकि बिना सुनवाई किसी पर कर नहीं लगाया जा सकता।

हालाँकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अब जबकि याचिकाकर्ता को नोटिस की जानकारी हो चुकी है, उसे तीन सप्ताह के भीतर नोटिस दिनांक 23.12.2023 का जवाब देना होगा।
अधिकारियों को कहा गया कि वे जवाब मिलने के बाद व्यक्तिगत सुनवाई दें और दो महीने के भीतर नया आदेश पारित करें।

इस प्रकार, अदालत ने मामला फिर से विचारार्थ विभाग को लौटा दिया ताकि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार और निष्पक्ष रूप से पूरी की जा सके।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

  • करदाताओं के लिए: यह निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साफ करता है कि केवल पोर्टल पर नोटिस डाल देना पर्याप्त नहीं है। विभाग को सुनिश्चित करना होगा कि नोटिस वास्तव में करदाता तक पहुँचे।
  • जीएसटी विभाग के लिए: अदालत ने चेताया कि “ऑनलाइन प्रणाली” का मतलब यह नहीं कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हैं। तकनीक न्याय का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहायक है।
  • मानवीय या टाइपिंग गलती वाले मामलों में: अगर करदाता ने वार्षिक रिटर्न में सही आंकड़े पहले ही दिखा दिए हैं, तो विभाग को बिना सुने टैक्स वसूली का आदेश नहीं देना चाहिए।
  • भविष्य की मुकदमेबाज़ी के लिए: इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हो गया कि जब प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हो, तो व्यक्ति सीधे उच्च न्यायालय जा सकता है, अपील करने की मजबूरी नहीं है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या याचिकाकर्ता को पहले अपील करनी चाहिए थी?
    • उत्तर: नहीं।
    • कारण: जब सुनवाई का मौलिक अधिकार ही नहीं दिया गया, तब अपील का रास्ता बताना व्यर्थ है।
  • क्या केवल पोर्टल पर अपलोड किया गया नोटिस पर्याप्त सेवा माना जा सकता है?
    • उत्तर: नहीं।
    • कारण: करदाता को इसकी जानकारी वास्तविक रूप से नहीं दी गई। यह न्यायसंगत सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
  • क्या 24.04.2024 का आदेश और DRC-07 वैध रह सकता है?
    • उत्तर: नहीं।
    • कारण: सुनवाई न होने के कारण आदेश निरस्त किया गया।
  • अदालत के निर्देश:
    • याचिकाकर्ता तीन सप्ताह में नोटिस का उत्तर दे।
    • अधिकारी व्यक्तिगत सुनवाई के बाद दो माह में नया आदेश पारित करें।

मामले का शीर्षक

Shree Ram Sales LLP बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 2768 of 2025

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बाजंथरी
  • माननीय श्री न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा

(मौखिक निर्णय दिनांक 24 फरवरी 2025)

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से:
    • श्री गौतम कुमार केजरीवाल, अधिवक्ता
    • श्री आलोक कुमार झा, अधिवक्ता
    • श्री मुकुंद कुमार, अधिवक्ता
    • श्री आकाश कुमार, अधिवक्ता
    • श्री आदित्य रमन, अधिवक्ता
  • राज्य/विभाग की ओर से:
    • श्री विवेक कुमार, सरकारी अधिवक्ता (GP-7)

निर्णय का लिंक

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