निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 2025 में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा एक बैंक अधिकारी पर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि बैंक ने बिना साक्ष्य के गंभीर दंड लगाया था और अपने ही सेवा नियमों का पालन नहीं किया। इस वजह से, अधिकारी को 06 फरवरी 2015 से सभी देय लाभों सहित बहाल करने का आदेश दिया गया। यह फैसला एक खंडपीठ द्वारा दिया गया, जिसमें माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और माननीय न्यायमूर्ति पार्थ सारथी शामिल थे।
यह मामला एक बैंक अधिकारी से जुड़ा था जो मुंगेर शाखा में सहायक शाखा प्रबंधक (Assistant Branch Manager) के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2013 में उनके खिलाफ साहेबगंज थाना, सहरसा में एक एफआईआर दर्ज हुई थी (धारा 406 और 420, भारतीय दंड संहिता)। हालांकि, बाद में पुलिस ने जांच कर “फाइनल रिपोर्ट” दाखिल की और अदालत ने उसे 24 फरवरी 2016 को स्वीकार कर लिया। इससे आपराधिक मामला खत्म हो गया, लेकिन बैंक ने समान आरोपों पर विभागीय कार्यवाही जारी रखी।
बैंक ने तीन आरोप लगाए:
- 15 मार्च 2013 को एक ग्राहक के खाते से ₹50,000 अनधिकृत रूप से निकालकर अपने खाते में डालना और फिर बाद में राशि लौटाना।
- 13 मार्च 2013 को अपनी पहचान बताए बिना “पर्सनल पब्लिक – अन्य” श्रेणी में एक नया खाता खोलना।
- 10 मई 2013 से 05 जून 2013 तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहना।
जांच अधिकारी ने 06 मई 2014 को अपनी रिपोर्ट दी। उन्होंने पाया कि पहला आरोप (₹50,000 की अनधिकृत निकासी) सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि सभी लेन-देन ग्राहक की सहमति वाले वाउचर से समर्थित थे। लेकिन दूसरे और तीसरे आरोप (अनुमति के बिना खाता खोलना और अनुपस्थिति) को सिद्ध माना गया।
हालांकि, जांच में कोई गवाह प्रस्तुत नहीं किया गया, और बैंक ने सिर्फ दस्तावेजों के आधार पर अधिकारी को दोषी ठहराया। यह बाद में न्यायालय के लिए एक बड़ा मुद्दा बना।
अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमति जताई और 06 फरवरी 2015 को अधिकारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया। अधिकारी ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन बाद में वह याचिका वापस ले ली। बाद में दूसरी याचिका (CWJC No. 19743/2015) में एकल न्यायाधीश ने पहली बर्खास्तगी और अपील आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को निर्देश दिया कि वे प्रक्रिया को “दूसरे शो कॉज नोटिस” से आगे बढ़ाएं।
इसके बाद, अधिकारी को जुलाई 2018 में फिर से बहाल किया गया और बैंक ने फरवरी 2019 में नया शो कॉज नोटिस जारी किया। 07 जून 2019 को बैंक ने फिर से दंड लगाया — अधिकारी को “अवार्ड स्टाफ” के पद पर घटा दिया गया और उनका वेतन ₹21,240 निश्चित कर दिया गया। अपील 20/21 नवंबर 2019 को खारिज कर दी गई। अधिकारी ने इस नए दंड को चुनौती देते हुए CWJC No. 1323/2020 दाखिल किया, जिसे 23 फरवरी 2024 को एकल न्यायाधीश ने खारिज कर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने LPA No. 283/2024 दायर किया, जिसे अब खंडपीठ ने स्वीकार किया।
खंडपीठ ने बैंक की कार्रवाई को दो मुख्य कारणों से रद्द कर दिया:
- साक्ष्य का अभाव (No Evidence):
न्यायालय ने पाया कि विभागीय जांच में कोई गवाह नहीं बुलाया गया, दस्तावेजों को ठीक से साबित नहीं किया गया, और न ही अधिकारी को क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन का मौका दिया गया। सिर्फ कागजी प्रमाणों के आधार पर सजा देना कानूनन गलत है। न्यायालय ने Roop Singh Negi v. Punjab National Bank (2009) और Satyendra Singh v. State of U.P. (2024) जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि “महत्वपूर्ण दंड” देने से पहले कम से कम कुछ ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है। - एसबीआई सेवा नियमों (Rule 68.3) का उल्लंघन:
जब जांच अधिकारी और अनुशासनिक प्राधिकारी के विचार अलग हों, तो नियम 68.3(iii) के अनुसार विशेष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। यहां अनुशासनिक प्राधिकारी की बजाय नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) ने दंड आदेश जारी किया, जो नियम के विपरीत था। इसलिए, आदेश प्रक्रियागत रूप से भी अवैध घोषित किया गया।
इन कारणों से अदालत ने एकल न्यायाधीश का आदेश भी रद्द कर दिया और कहा कि अधिकारी को 06 फरवरी 2015 से सभी लाभों सहित पुनः बहाल किया जाए। बैंक को तीन महीने के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
- यह फैसला सरकारी और बैंक कर्मचारियों दोनों के लिए एक मिसाल है। यह बताता है कि विभागीय कार्यवाही भी न्यायिक मानकों के अनुसार होनी चाहिए।
- बैंक या सरकारी विभाग सिर्फ दस्तावेजों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहरा सकते।
- यह निर्णय दिखाता है कि यदि किसी पर गंभीर आरोप हैं, तब भी विभागीय जांच में निष्पक्षता और पारदर्शिता जरूरी है।
- इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि यदि कोई आपराधिक मामला बंद हो जाता है, तो विभागीय कार्रवाई जारी रह सकती है, परंतु उसके लिए साक्ष्य होना आवश्यक है।
- यह फैसला सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) और सरकारी कार्यालयों के लिए चेतावनी है कि नियमों का पालन न करने पर पूरे मामले को अवैध घोषित किया जा सकता है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या बिना गवाह या साक्ष्य के विभागीय जांच में गंभीर दंड दिया जा सकता है?
- नहीं। अदालत ने कहा कि यह “नो एविडेंस” का मामला था।
- क्या बैंक ने SBI Officers’ Service Rules के नियम 68.3 का पालन किया?
- नहीं। अनुशासनिक प्राधिकारी को स्वयं प्रक्रिया पूरी करनी थी, न कि नियुक्ति प्राधिकारी को।
- क्या आपराधिक मामला बंद होने के बाद विभागीय कार्रवाई जारी रह सकती है?
- हाँ, परंतु पर्याप्त साक्ष्य और उचित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
- क्या एकल न्यायाधीश का फैसला सही था?
- नहीं। खंडपीठ ने उसे पलट दिया।
- अंतिम राहत:
- दंड आदेश (07.06.2019) और अपील आदेश (20/21.11.2019) रद्द।
- अधिकारी को 06.02.2015 से सभी लाभों सहित पुनः बहाली।
- बैंक को तीन महीने में बकाया भुगतान करने का निर्देश।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, (2009) 2 SCC 570
- Deputy General Manager v. Ajai Kumar Srivastava, (2021) 2 SCC 612
- Satyendra Singh v. State of U.P., 2024 SCC OnLine SC 3325
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, (2009) 2 SCC 570
- Satyendra Singh v. State of U.P., 2024 SCC OnLine SC 3325
- Karnataka Power Transmission Corpn. Ltd. v. C. Nagaraju, (2019) 10 SCC 367
- State of Karnataka v. Umesh, (2022) 6 SCC 563
- State Bank of India v. Tarun Kumar Banerjee, (2000) 8 SCC 12
- General Manager (P), Punjab & Sind Bank v. Daya Singh, (2010) 11 SCC 233
- State Bank of India v. Narendra Kumar Pandey, (2013) 2 SCC 740
- State Bank of India v. Ramesh Dinkar Punde, (2006) 7 SCC 212
- S.N. Mukherjee v. Union of India, (1990) 4 SCC 594
मामले का शीर्षक
Rakesh Roshan Gupta Vs. The Chairman-cum- Managing Director, State Bank of India
केस नंबर
Letters Patent Appeal No. 283 of 2024
संबंधित याचिकाएँ – CWJC No. 1323/2020, CWJC No. 19743/2015
उद्धरण (Citation)
2025 (2) PLJR 120
न्यायमूर्ति गण का नाम
- माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश
- माननीय न्यायमूर्ति पार्थ सारथी (निर्णय लेखक)
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- अपीलकर्ता (बैंक अधिकारी) की ओर से:
- श्री मृगांक मौली, वरिष्ठ अधिवक्ता
- श्री राकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता
- श्री संकेत, अधिवक्ता
- श्री नवीन कुमार सिंह, अधिवक्ता
- श्री अमरेश कुमार, अधिवक्ता
- प्रतिवादी (SBI) की ओर से:
- श्री संजीव कुमार, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक
MyMyODMjMjAyNCMxI04=-s7ASvJveIG8=
“यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।”


