पटना उच्च न्यायालय का निर्णय : बैंक की गलती से दी गई पेंशन की वसूली विधवा से नहीं होगी (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2022 को एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि किसी विधवा से वह राशि वापस नहीं ली जा सकती जो बैंक की गलती से उसके परिवारिक पेंशन खाते में जमा हो गई थी। अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें बैंक ने विधवा से लगभग ₹3.5 लाख की वसूली शुरू की थी।

यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था जिसके पति सड़क निर्माण विभाग (पूर्व में लोक निर्माण विभाग) में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी थे। वे 1982 में सेवानिवृत्त हुए और 1988 में उनका निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी को परिवारिक पेंशन मिलनी शुरू हुई, जो सालों तक नियमित रूप से मिलती रही।

समस्या तब शुरू हुई जब बैंक ने 2018–2019 में अचानक यह कहकर नोटिस जारी किया कि विधवा को पिछले कई वर्षों से “अधिक पेंशन” दी जा रही थी और अब ₹3,43,792/- (बाद में ₹3,51,020/- बताई गई) की राशि वापस ली जाएगी। इसके बाद उसकी मासिक पेंशन ₹15,000 से घटकर लगभग ₹7,000 रह गई।

बैंक का कहना था कि तकनीकी गलती से विधवा का खाता “फैमिली पेंशन” के बजाय “रेगुलर पेंशन” के रूप में दर्ज कर दिया गया था, और जन्मतिथि भी गलत दर्ज हो गई थी, जिससे उम्र के आधार पर मिलने वाली अतिरिक्त राशि भी गलत तरीके से दी जाती रही। यह गलती करीब 11 साल 8 महीने तक चलती रही।

विधवा ने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा कि:

  • वह निरक्षर महिला है,
  • उसने कभी बैंक को गलत जानकारी नहीं दी,
  • पेंशन निर्धारण में उसकी कोई भूमिका नहीं थी,
  • इसलिए बैंक को उससे राशि वापस नहीं लेनी चाहिए।

उसने सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला दिया, विशेष रूप से State of Punjab v. Rafiq Masih (2015) 4 SCC 334 और Thomas Daniel v. State of Kerala (2022 SCC OnLine SC 536), जिनमें कहा गया है कि किसी गरीब, सेवानिवृत्त या निर्भर व्यक्ति से गलती से दी गई राशि की वसूली नहीं की जा सकती जब कोई धोखाधड़ी नहीं की गई हो।

बैंक ने जवाब दिया कि विधवा ने पेंशन शुरू करते समय एक “undertaking” पर हस्ताक्षर किए थे कि यदि कोई अतिरिक्त राशि दी जाएगी तो वह वापस करेगी। इस आधार पर बैंक ने High Court of Punjab & Haryana v. Jagdev Singh (2016) 14 SCC 267 का हवाला दिया।

किन्तु पटना उच्च न्यायालय ने बैंक का यह तर्क खारिज कर दिया। अदालत ने कहा:

  1. यह मामला किसी धोखाधड़ी का नहीं है। बैंक की ही गलती से यह भुगतान हुआ।
  2. विधवा एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी की पत्नी है, जो परिवारिक पेंशन पर निर्भर है।
  3. सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे मामलों में वसूली अनुचित है।
  4. Jagdev Singh वाला मामला अधिकारी स्तर के कर्मचारी से जुड़ा था, जबकि यहाँ एक निरक्षर विधवा है।
  5. बैंक ने 11 साल तक गलती सुधारने की कोशिश नहीं की — यह उसकी गंभीर लापरवाही है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि बैंक इतने वर्षों तक “सोया” रहा तो अब वह अपनी गलती का बोझ एक असहाय विधवा पर नहीं डाल सकता।

अंत में, अदालत ने बैंक के वसूली आदेश को रद्द कर दिया और विधवा की याचिका को स्वीकार कर लिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • गरीब और निर्भर व्यक्तियों की सुरक्षा: यह फैसला बताता है कि न्यायालय ऐसे लोगों की रक्षा करेगा जो सरकार या बैंक की गलती से प्रभावित होते हैं, लेकिन खुद किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं करते।
  • बैंकों की जवाबदेही: अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि बैंक अपनी तकनीकी गलतियों का बोझ पेंशनरों पर नहीं डाल सकता।
  • मानवीय दृष्टिकोण: यह निर्णय न्यायालय की संवेदनशील सोच को दर्शाता है — पेंशन कोई दान नहीं बल्कि व्यक्ति का अधिकार है।
  • प्रशासनिक लापरवाही पर नियंत्रण: यह फैसला सरकार और बैंकों दोनों को यह संदेश देता है कि वे पेंशन डेटा को समय पर अपडेट करें और गलतियाँ वर्षों तक न चलने दें।
  • बिहार के पेंशनरों के लिए राहत: इस फैसले से उन विधवाओं और आश्रितों को राहत मिलेगी जिन्हें इसी तरह बैंक या विभागों द्वारा नोटिस भेजे गए हैं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • प्रश्न: क्या बैंक अपनी गलती से दी गई अतिरिक्त पेंशन की राशि 11 साल बाद विधवा से वसूल सकता है?
    • निर्णय: नहीं।
    • तर्क: Rafiq Masih के फैसले के अनुसार, ऐसे मामलों में वसूली अनुचित है जब व्यक्ति ने कोई गलत सूचना नहीं दी और भुगतान 5 साल से अधिक समय तक जारी रहा।
  • प्रश्न: क्या विधवा द्वारा दिया गया “undertaking” बैंक को वसूली का अधिकार देता है?
    • निर्णय: नहीं।
    • तर्क: Jagdev Singh वाला फैसला यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि वह अधिकारी स्तर के व्यक्ति का मामला था। एक निरक्षर विधवा द्वारा दिया गया undertaking विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।
  • प्रश्न: क्या बैंक की देरी (11 साल बाद गलती पकड़ना) उसके वसूली अधिकार को प्रभावित करती है?
    • निर्णय: हाँ, यह बैंक की गलती को और गंभीर बनाती है।
    • तर्क: Rafiq Masih के अनुसार, यदि 5 साल से अधिक समय तक भुगतान होता रहा और फिर गलती पाई गई, तो वसूली नहीं की जा सकती।
  • प्रश्न: क्या विधवा को 7वें वेतन आयोग के अनुसार संशोधित पेंशन मिलेगी?
    • निर्णय: अदालत ने कहा कि बैंक सही गणना करे और उचित दर से पेंशन देना जारी रखे।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Akhileshwari Devi v. Union of India, CWJC No. 4156/2018, पटना उच्च न्यायालय, दिनांक 01.07.2019
  • Thomas Daniel v. State of Kerala, 2022 SCC OnLine SC 536
  • Kalawati Devi v. Union of India, CWJC No. 4050/2019, पटना उच्च न्यायालय
  • State of Punjab v. Rafiq Masih (White Washer), (2015) 4 SCC 334
  • High Court of Punjab & Haryana v. Jagdev Singh, (2016) 14 SCC 267
  • Paras Nath Singh v. State of Bihar, (2009) 6 SCC 314

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • State of Punjab v. Rafiq Masih, (2015) 4 SCC 334
  • Thomas Daniel v. State of Kerala, 2022 SCC OnLine SC 536
  • Paras Nath Singh v. State of Bihar, (2009) 6 SCC 314
  • Syed Abdul Qadir v. State of Bihar, (2009) 3 SCC 475
  • Shyam Babu Verma v. Union of India, (1994) 2 SCC 521
  • B.J. Akkara v. Govt. of India, (2006) 11 SCC 709
  • Sahib Ram v. State of Haryana, 1995 Supp (1) SCC 18
  • Assistant General Manager, SBI v. Akhileshwari Devi, LPA No. 270/2021, दिनांक 19.07.2022

मामले का शीर्षक

एक विधवा बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 8386 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 27

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से — अधिवक्ता (नाम निर्णय में उपलब्ध)
  • बिहार राज्य की ओर से — शासकीय अधिवक्ता
  • भारतीय स्टेट बैंक की ओर से — वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सहयोगी अधिवक्ता
  • लेखा महानियंत्रक, बिहार की ओर से — अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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