निर्णय की सरल व्याख्या
पटना हाई कोर्ट ने फरवरी 2021 में एक अहम फैसला सुनाया। यह मामला सड़क निर्माण विभाग के छह सेवानिवृत्त कर्मचारियों का था। इन कर्मचारियों की नियुक्ति साल 1984 में हुई थी, लेकिन यह नियुक्ति दैनिक वेतन/मस्टर रोल (daily wage/muster roll) पर थी, क्योंकि उस समय नियमित नियुक्तियों पर रोक लगी हुई थी।
बाद में, बिहार सरकार ने 1993 में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि जो कर्मचारी 1 अगस्त 1985 से पहले लगे हैं और जिन्होंने 240 दिन की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर नियमित नियुक्ति दी जा सकती है। कई कर्मचारियों को इसका लाभ मिला और वे जल्दी ही नियमित हो गए, लेकिन इन याचिकाकर्ताओं को लगभग 20 साल बाद, 30 अक्टूबर 2013 को ही नियमित नियुक्ति मिल सकी।
समस्या तब शुरू हुई जब ये कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने मांग की कि उनकी पिछली सेवा (1980 के दशक से लेकर 2013 में नियमित होने तक) को पेंशन और ग्रेच्युटी की गणना में जोड़ा जाए। परंतु विभाग ने 2015 और फिर 2018 में उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि दैनिक वेतन पर की गई सेवा को सरकारी सेवा नहीं माना जा सकता और इसलिए यह पेंशन के लिए गिनी नहीं जाएगी।
कर्मचारियों ने दलील दी कि यह भेदभाव है क्योंकि ऐसे ही अन्य कर्मचारियों को लाभ मिल चुका है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया, जैसे — State of Bihar v. Sunny Prakash (2013) 3 SCC 559 और Netram Sahu v. State of Chhattisgarh (2018), जिनमें लंबे समय तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट लाभ दिए गए थे।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने पटना हाई कोर्ट के फुल बेंच के फैसले Bhagwan Singh v. State of Bihar (2014 (4) PLJR 229) पर भरोसा किया। इसमें साफ कहा गया था कि दैनिक वेतन पर की गई सेवा को पेंशन के लिए नहीं जोड़ा जा सकता।
हाई कोर्ट ने माना कि पेंशन किसी पर “सरकारी इनाम” नहीं है बल्कि यह सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है। लेकिन साथ ही यह भी देखा कि बिहार पेंशन नियम 1950 और 2006 की सरकारी संकल्प (resolution) स्पष्ट रूप से दैनिक वेतन सेवा को बाहर रखते हैं। अदालत ने कहा कि जब तक सरकार खुद कोई नीति नहीं बनाती, अदालत इन सेवाओं को पेंशन में जोड़ने का आदेश नहीं दे सकती।
इसलिए अदालत ने याचिका खारिज कर दी और कर्मचारियों को राहत नहीं दी। हालांकि, अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को यह संकेत दिया कि ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण से नई नीति बनाने पर विचार करना चाहिए।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
- कर्मचारियों के लिए: यह फैसला बताता है कि दैनिक वेतन सेवा अपने आप पेंशन के लिए नहीं गिनी जाएगी। जब तक सरकार कोई अलग नीति न बनाए, पेंशन की गणना केवल नियमित सेवा से ही होगी।
- सरकारी विभागों के लिए: यह फैसला उन्हें याद दिलाता है कि उन्हें 2006 की संकल्प और पेंशन नियमों का पालन करना होगा।
- आम जनता के लिए: यह मामला दिखाता है कि अदालतें न्याय और नियमों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं।
- नीति के स्तर पर: फैसला इस ओर इशारा करता है कि लंबे समय तक सेवा देने वाले दिहाड़ी कर्मचारियों के लिए मानवीय दृष्टिकोण से सरकार को नई नीति बनानी चाहिए।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- मुद्दा 1: क्या नियमित होने से पहले की दैनिक वेतन सेवा पेंशन में गिनी जा सकती है?
- निर्णय: नहीं, बिहार पेंशन नियम 1950 और 2006 की संकल्प के अनुसार यह मान्य नहीं है।
- मुद्दा 2: क्या याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव हुआ?
- निर्णय: अदालत ने माना कि नियम और सरकारी संकल्प ही मान्य होंगे, इसलिए समानता का दावा नहीं बनता।
- मुद्दा 3: क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले Netram Sahu जैसे मामलों को लागू किया जा सकता है?
- निर्णय: नहीं, क्योंकि वे मामले ग्रेच्युटी से जुड़े थे, जबकि यहाँ पेंशन का मुद्दा है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- State of Bihar v. Sunny Prakash, (2013) 3 SCC 559
- Netram Sahu v. State of Chhattisgarh, Civil Appeal No. 1254 of 2018
- Amarkant Rai v. State of Bihar, (2015) 2 SCC 437
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Bhagwan Singh v. State of Bihar, 2014 (4) PLJR 229 (पटना हाई कोर्ट फुल बेंच)
- Secretary, State of Karnataka v. Umadevi (3), (2006) 4 SCC 1
- Direct Recruit Class-II Engineering Officers’ Association v. State of Maharashtra, AIR 1990 SC 1607
मामले का शीर्षक
याचिकाकर्ता (सेवानिवृत्त कर्मचारी) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 18826 of 2018
उद्धरण (Citation)
2021(1) PLJR 823
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपाध्याय
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री अजय कुमार चक्रवर्ती, अधिवक्ता
- प्रतिवादी/राज्य की ओर से: श्री मनोज कुमार अम्बष्ठा, SC-26
निर्णय का लिंक
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