पटना हाई कोर्ट 2021 का फैसला: शिक्षक की आकस्मिक मृत्यु पर आश्रित की नियुक्ति और 2006 नियमों की सीमा

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला एक ऐसे पुत्र से जुड़ा है, जिसके पिता सहायक शिक्षक पद पर कार्यरत थे और सेवा के दौरान उनकी मृत्यु 11 सितंबर 2006 को हो गई। पिता की मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता ने अनुकंपा नियुक्ति (compassionate appointment) की मांग की।

  • जिला अनुकंपा समिति ने 25 जनवरी 2008 को याचिकाकर्ता की नियुक्ति की सिफारिश की और उसे ₹4500–7000 वेतनमान पर नियुक्त करने की अनुशंसा की।
  • इसके बाद याचिकाकर्ता को 20 जून 2008 को प्रखंड शिक्षक (Block Teacher) के रूप में नियुक्त किया गया।
  • लेकिन इस बीच, शिक्षक नियुक्ति नियमावली, 2006 प्रभावी हो चुकी थी (01 जुलाई 2006 से)। इन नियमों ने पुरानी नियमित शिक्षक नियुक्ति नियमावली को निरस्त कर दिया था।
  • इसलिए, याचिकाकर्ता को सहायक शिक्षक (नियमित पद) के स्थान पर प्रखंड शिक्षक बनाया गया और नियमित वेतनमान नहीं दिया गया।

याचिकाकर्ता ने इसे चुनौती देते हुए 2010 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि जिला समिति ने उनकी नियुक्ति नियमित शिक्षक के रूप में की थी, इसलिए उन्हें नियमित वेतनमान मिलना चाहिए। एकल पीठ ने 28 जनवरी 2010 को याचिका स्वीकार कर उन्हें नियमित सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त करने का आदेश दिया।

राज्य की अपील और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ LPA (Letters Patent Appeal) दायर किया। इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2017) में यह मुद्दा स्पष्ट किया कि—

  • जिनकी अनुशंसा 01 जुलाई 2006 से पहले हुई है, वे नियमित कक्षा-III या कक्षा-IV पदों पर नियुक्ति या नियमित वेतनमान पाने के हकदार होंगे।
  • जिनकी नियुक्ति 01 जुलाई 2006 के बाद हुई है, उन्हें नियमित वेतनमान का हक नहीं मिलेगा और वे केवल प्रखंड शिक्षक पद पर नियुक्त होंगे। हालांकि, ऐसे लोग राज्य सरकार से अन्य राहत मांग सकते हैं।

हाई कोर्ट का फैसला

पटना हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त फैसले को लागू करते हुए कहा कि—

  • याचिकाकर्ता की नियुक्ति जून 2008 में हुई थी, जो 2006 नियमों के लागू होने के बाद की है।
  • इसलिए उन्हें नियमित सहायक शिक्षक का वेतनमान नहीं मिल सकता।
  • इस आधार पर, LPA (राज्य की अपील) को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप निपटा दिया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

  • नियमों की स्पष्टता: अब यह पूरी तरह तय है कि 01 जुलाई 2006 से पहले और बाद में नियुक्त हुए अनुकंपा कर्मियों के अधिकार अलग-अलग होंगे।
  • कट-ऑफ तिथि का महत्व: 2006 नियमों की प्रभावी तिथि ही यह निर्धारित करेगी कि आश्रित को नियमित पद मिलेगा या नहीं।
  • नीति संतुलन: कोर्ट ने पुराने मामलों में आश्रितों के अधिकार सुरक्षित रखे, वहीं 2006 के बाद की सरकारी नीति को भी बरकरार रखा।
  • अन्य राहत की संभावना: हालांकि 2006 के बाद नियुक्त हुए लोगों को नियमित वेतनमान नहीं मिलेगा, लेकिन वे सरकार से उपयुक्त राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या याचिकाकर्ता को नियमित सहायक शिक्षक का वेतनमान मिलना चाहिए था?
    ➡ नहीं। क्योंकि उनकी नियुक्ति 2006 नियमों के लागू होने के बाद हुई थी।
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले पर कैसे लागू हुआ?
    ➡ मुकेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2017) के अनुसार, 01 जुलाई 2006 के बाद नियुक्त लोगों को नियमित वेतनमान का अधिकार नहीं है।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • मुकेश कुमार एवं अन्य बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 4773–4779, वर्ष 2017 (सुप्रीम कोर्ट)

मामले का शीर्षक

The State of Bihar v. Sanjit Kumar

केस नंबर

Letters Patent Appeal No. 217 of 2011 (CWJC No. 310 of 2010 से उत्पन्न)

उद्धरण (Citation)

2021(1)PLJR 555

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय मुख्य न्यायाधीश संजय करोळ
माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • राज्य की ओर से: श्री राजेश्वर सिंह, GA-10
  • प्रतिवादी की ओर से: कोई उपस्थित नहीं

निर्णय का लिंक

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMyMTcjMjAxMSMxI04=-Sd–am1–xNBdtOxk=

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