पटना हाई कोर्ट का फैसला: लंबित आपराधिक मामले के बीच वर्षों बाद शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को रद्द किया गया

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया जिसमें रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के एक पूर्व सहायक उप निरीक्षक के खिलाफ वर्षों बाद दोबारा शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को असंवैधानिक करार दिया गया। यह मामला भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़ा था, और कर्मचारी के खिलाफ पहले से ही सीबीआई द्वारा आपराधिक मामला चल रहा था।

मामला 2014 का है, जब याचिकाकर्ता को सीबीआई ने रिश्वत लेते हुए पकड़ा था। इसके तुरंत बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया और RPF नियमावली, 1987 की धारा 153 के तहत विभागीय जांच शुरू की गई।

हालांकि, जांच अधिकारी ने 2016 में रिपोर्ट देकर यह राय दी कि जब तक आपराधिक मामला कोर्ट द्वारा तय नहीं हो जाता, तब तक विभागीय जांच में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह राय स्वीकार करते हुए, विभागीय प्राधिकरण ने मई 2016 में आदेश जारी कर विभागीय कार्यवाही को आपराधिक मुकदमे के फैसले तक स्थगित कर दिया।

लगभग साढ़े तीन साल बाद, फरवरी 2020 में एक नया आरोप पत्र भेजकर उसी पुराने मामले में फिर से जांच शुरू करने का प्रयास किया गया। याचिकाकर्ता ने इस कदम को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब पहले ही विभागीय प्राधिकरण ने जांच को स्थगित कर दिया था, तो इतने वर्षों बाद उसी घटना पर फिर से कार्यवाही शुरू करना नियमों का उल्लंघन है। खासतौर पर रेलवे सुरक्षा बल नियमावली की धारा 219(4) के अनुसार, कोई भी उच्च अधिकारी एक वर्ष के भीतर ही पूर्ववर्ती आदेश को संशोधित कर सकता है। इस अवधि के बाहर किया गया कोई भी संशोधन अमान्य होता है।

सरकार की ओर से यह कहा गया कि उच्च अधिकारियों के निर्देश के तहत यह कदम उठाया गया क्योंकि पहले के आरोप पत्र में कुछ त्रुटियां थीं। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही आरोप पर आपराधिक मामला और विभागीय जांच साथ-साथ चल सकती हैं।

परंतु न्यायालय ने साफ कहा कि विभागीय कार्यवाही को पुनः प्रारंभ करने का प्रयास कानूनी समयसीमा के बाहर किया गया था। नियम 219(4) की अनदेखी करते हुए चार साल बाद फिर से नोटिस जारी करना न तो वैधानिक था और न ही न्यायसंगत।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

इस फैसले का महत्त्व सरकारी कर्मचारियों और सरकारी विभागों दोनों के लिए अत्यधिक है:

  • यह सुनिश्चित करता है कि विभागीय कार्यवाही समयसीमा के भीतर और वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही की जानी चाहिए।
  • यह कर्मचारियों को वर्षों बाद अचानक दोबारा कार्यवाही झेलने से संरक्षण देता है, खासकर जब पहले ही मामला स्थगित किया जा चुका हो।
  • यह फैसले यह भी स्पष्ट करता है कि उच्च अधिकारियों को भी अपने अधिकार सीमित समय में ही प्रयोग करने चाहिए।

रेलवे सुरक्षा बल और अन्य सरकारी विभागों के लिए यह निर्णय एक मिसाल है कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और नियमों का पालन अनिवार्य है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या लंबित आपराधिक मुकदमे के दौरान वर्षों बाद विभागीय कार्यवाही दोबारा शुरू की जा सकती है?
    • न्यायालय का निर्णय: नहीं, नियम 219(4) के तहत एक वर्ष की समयसीमा के बाद ऐसा करना गैरकानूनी है।
  • क्या एक ही घटना पर दोबारा नया आरोप पत्र जारी करना नियमों के अनुरूप है?
    • न्यायालय का निर्णय: नहीं, पहले ही जब कार्यवाही को स्थगित किया जा चुका था, तब नया आरोप पत्र जारी करना वैध नहीं है।
  • क्या जांच अधिकारी की राय कि निर्णय तब तक न लिया जाए जब तक आपराधिक मामला न सुलझे, स्वीकार्य थी?
    • न्यायालय का निर्णय: हाँ, और उस पर आधिकारिक आदेश भी पहले ही जारी हो चुका था।
  • क्या उच्च अधिकारी नियम 219(4) का प्रयोग करके इतने वर्षों बाद आदेश बदल सकते हैं?
    • न्यायालय का निर्णय: नहीं, नियम के अनुसार यह केवल एक वर्ष के भीतर ही किया जा सकता है।

मामले का शीर्षक

Nasibullah v. East Central Railway & Ors.

केस नंबर

CWJC No. 7343 of 2020

उद्धरण (Citation)

2021(1)PLJR 361

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री बिंध्याचल सिंह, श्री राम बिनोद सिंह
  • प्रतिवादी की ओर से: श्री कुमार प्रिया रंजन

निर्णय का लिंक

MTUjNzM0MyMyMDIwIzEjTg==-lKqZs0v3ZOQ=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News