पटना हाई कोर्ट ने बिना उचित कारण बताए कालीसूची में डाले जाने का आदेश रद्द किया

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 9 मई 2024 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक निजी ठेकेदार को कालीसूची (Blacklist) में डाला गया था। कोर्ट ने पाया कि संबंधित ठेकेदार को न तो उचित कारण बताया गया था और न ही अपनी बात रखने का अवसर दिया गया था।

मामला यह था कि एक प्रिंटिंग प्रेस को बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक सार्वजनिक सूचना के माध्यम से कालीसूची में डाल दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे किसी स्पष्ट कारण या आरोप की जानकारी नहीं दी गई थी, न ही उसे सफाई देने का मौका मिला था। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 25 जनवरी 2024 को एक पत्र जारी किया गया था, जिसमें कहा गया था कि यदि कुछ सामग्री को हटाया नहीं गया तो कार्रवाई की जाएगी, जिसमें ब्लैकलिस्टिंग भी शामिल हो सकती है। लेकिन इस पत्र में कोई स्पष्ट आरोप नहीं था, और न ही यह कोई कानूनी रूप से उचित “शोकॉज नोटिस” (Show-Cause Notice) था।

बाद में सरकार ने सीधे एक सार्वजनिक सूचना जारी कर दी जिसमें याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। यह आदेश उस पुराने पत्र का भी कोई उल्लेख नहीं करता, और न ही यह बताता है कि क्या वास्तव में सामग्री नहीं हटाई गई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी को कालीसूची में डालना एक गंभीर निर्णय है, जो व्यक्ति की प्रतिष्ठा और भविष्य की सरकारी ठेकों में भागीदारी पर प्रभाव डालता है। इसलिए, ऐसा निर्णय लेने से पहले कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का पालन अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि एक वैध शोकॉज नोटिस में निम्नलिखित बातें होनी चाहिए:

  1. उस व्यक्ति के खिलाफ क्या आरोप हैं — ये स्पष्ट रूप से लिखे होने चाहिए।
  2. विभाग किस प्रकार की कार्रवाई करने जा रहा है — यह भी बताना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि 25.01.2024 को जारी पत्र किसी भी तरह से वैध शोकॉज नोटिस नहीं था। इसलिए, कालीसूची में डालने का आदेश पूरी तरह से न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला सरकारी विभागों के लिए एक कड़ा संदेश है कि वे किसी भी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ गंभीर कार्रवाई करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करें। आम नागरिकों और सरकारी ठेकेदारों के लिए यह एक राहत की बात है कि सरकार मनमानी नहीं कर सकती। अगर किसी को ब्लैकलिस्ट किया जाना है, तो पहले उचित नोटिस देकर उसे अपनी बात कहने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।

इससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकारी कार्यवाही पारदर्शी हो और संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या याचिकाकर्ता को उचित शोकॉज नोटिस दिए बिना ब्लैकलिस्ट किया गया?
    ✔️ हाँ, कोर्ट ने कहा कि 25.01.2024 का पत्र एक वैध शोकॉज नोटिस नहीं था।
  • क्या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ?
    ✔️ हाँ, याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला।
  • कोर्ट ने क्या राहत दी?
    ✔️ कोर्ट ने Annexure-17 के तहत जारी ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही, सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि वह चाहें तो उचित शोकॉज नोटिस जारी कर सकती है।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Oryx Fisheries Pvt. Ltd. बनाम भारत सरकार, (2010) 13 SCC 427
  • Gorkha Security Services बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार, (2014) 9 SCC 105
  • Erusian Equipment & Chemicals Ltd. बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, (1975) 1 SCC 70

मामले का शीर्षक

M/S Vijayshree Press बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 2517 of 2024

माननीय न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन
माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

श्री प्रशांत सिन्हा, अधिवक्ता — याचिकाकर्ता की ओर से
श्री विकास कुमार, अधिवक्ता — प्रतिवादी राज्य की ओर से

निर्णय का लिंक

https://www.patnahighcourt.gov.in/ShowPdf/web/viewer.html?file=../../TEMP/1b6ae3d0-ff53-44f0-90af-8ef50642720e.pdf&search=Blacklisting

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