निर्णय की सरल व्याख्या
इस मामले में पटना हाई कोर्ट ने 1997 में भोजपुर जिले के एक गांव में हुई मारपीट और हत्या के मामले में तीन महिला आरोपियों की बरी होने के खिलाफ दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। मामला एक आम घरेलू विवाद से शुरू हुआ जो आम के पेड़ से आम तोड़ने को लेकर हुआ था, लेकिन विवाद इतना बढ़ गया कि कुछ लोगों को गंभीर चोटें आईं और एक व्यक्ति की मौत हो गई।
प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, पीड़ित पक्ष के कुछ सदस्यों पर लाठी और ईंट से हमला हुआ था। आरोप था कि कुछ पुरुषों ने सीधे लाठी से हमला किया और तीन महिलाएं (जिन्हें आरोपी नंबर 2 से 4 कहा गया है) ने घर की छत से ईंट फेंकी, जिससे और लोगों को चोटें आईं।
इस केस में कई सालों तक ट्रायल चला और इस दौरान कुछ आरोपी पुरुषों की मौत भी हो गई। अंत में तीन महिला आरोपियों पर ट्रायल चला और सेशंस कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि न तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश की गई और न ही किसी डॉक्टर की गवाही हुई। इससे यह साबित नहीं हो पाया कि मृतक की मौत इन महिला आरोपियों द्वारा ईंट फेंकने से हुई।
इस फैसले के खिलाफ मृतक के परिवार ने हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं पाई और अपील खारिज कर दी।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला हमारे न्यायिक तंत्र के उस सिद्धांत को मजबूत करता है जिसमें कहा गया है कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध साबित न हो जाए, तब तक वह निर्दोष माना जाता है।
आम जनता के लिए यह फैसला यह संदेश देता है कि किसी को सजा दिलवाने के लिए केवल मौखिक गवाही काफी नहीं है। न्यायालय मेडिकल रिपोर्ट, स्वतंत्र गवाह और अन्य ठोस सबूतों पर ज्यादा भरोसा करता है।
पुलिस और अभियोजन पक्ष के लिए यह एक सीख है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो सबूत भी उतने ही ठोस होने चाहिए, खासकर जब मामला हत्या का हो।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या अभियोजन पक्ष यह साबित कर पाया कि महिला आरोपियों ने मृतक को जानबूझकर चोट पहुंचाई?
❌ नहीं। मेडिकल साक्ष्य की अनुपस्थिति और विरोधाभासी गवाहियों के कारण यह साबित नहीं हो सका। - क्या सेशंस कोर्ट का बरी करने का निर्णय सही था?
✅ हां। हाई कोर्ट ने पाया कि यह एक संभावित और उचित निर्णय था, जिस पर हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Harbans Singh v. State of Punjab, 1961 SCC OnLine SC 40
- Chandrappa v. State of Karnataka, (2007) 4 SCC 415
- Murugesan v. State, (2012) 10 SCC 383
- H.D. Sundara v. State of Karnataka, (2023) 9 SCC 581
- Babu Sahebagouda Rudragoudar v. State of Karnataka, 2024 SCC OnLine SC 561
मामले का शीर्षक
Brij Bihari Ray vs. The State of Bihar & Others
केस नंबर
Criminal Appeal (DB) No.108 of 2021
उद्धरण (Citation)– 2025 (1) PLJR 58
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
श्री तेज प्रताप सिंह — अपीलकर्ता की ओर से
श्री ए.जी. — राज्य की ओर से
(अन्य वकीलों के नाम दस्तावेज़ में नहीं हैं)
निर्णय का लिंक
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