निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट, शेखपुरा द्वारा 2018 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक शादी को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी गई थी। यह मामला एक नाबालिग लड़के की कथित जबरन शादी से जुड़ा था, जिसमें उसकी सहमति के बिना शादी कराई गई थी और दोनों पक्ष उस समय कानूनी उम्र से कम थे।
अपीलकर्ता—एक पिता और उसका बेटा—ने अदालत को बताया कि 4 मई 2013 को जब बेटा (अपीलकर्ता संख्या 2) अपनी कक्षा 11वीं की परीक्षा देकर लौट रहा था, तब उसे अगवा कर लिया गया और नवादा जिले के एक गांव में एक मंदिर में जबरन शादी कर दी गई। यह शादी बिना उसकी मर्जी और बिना कानूनी सहमति के कराई गई।
इस दावे के समर्थन में, उन्होंने दस्तावेज प्रस्तुत किए—लड़के की मैट्रिक का प्रमाणपत्र जिसमें उसकी जन्मतिथि 15 सितंबर 1997 दर्ज है, और लड़की के स्कूल दस्तावेजों के अनुसार उसकी जन्मतिथि 8 फरवरी 2002 है। यानी, शादी के समय दोनों नाबालिग थे। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(iii) के अनुसार लड़के की उम्र 21 और लड़की की उम्र 18 साल पूरी होना अनिवार्य है।
शादी के अगले ही दिन यानी 5 मई 2013 को अपहरण की एफआईआर दर्ज की गई (केस संख्या 93/2013, थाना बर्बिघा), और अगले दिन यानी 6 मई को लड़के का बयान धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज किया गया, जिसमें उसने शादी की जबरदस्ती और अपहरण की पुष्टि की।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इन सबूतों को नज़रअंदाज़ करते हुए याचिका खारिज कर दी। उसने समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का हवाला दिया, लेकिन कोई पुख्ता कानूनी तर्क नहीं दिया। न ही प्रतिवादियों ने दस्तावेज़ी साक्ष्य दिए जो यह साबित कर सके कि अपीलकर्ता बालिग था या शादी स्वेच्छा से हुई थी।
उच्च न्यायालय ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर गलत तरीके से निर्णय दिया। अदालत ने दो टूक कहा कि परंपरा या समाज में मान्य कोई रिवाज कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
अब मामला फिर से फैमिली कोर्ट, शेखपुरा को सुनवाई के लिए भेजा गया है, और आदेश दिया गया है कि वह तीन महीने के भीतर इस मामले पर पुनः निर्णय दे।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय खास तौर पर बिहार जैसे राज्यों में बहुत अहम है, जहां जबरन या नाबालिगों की शादी की घटनाएं सामने आती रहती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी शादी में कानून के अनुसार उम्र और स्वैच्छिक सहमति अनिवार्य है। केवल सामाजिक परंपरा के आधार पर शादी को वैध नहीं माना जा सकता।
यह फैसला पीड़ित परिवारों को न्याय की उम्मीद देता है कि अगर स्थानीय अदालतों में गलती होती है, तो उच्च न्यायालय उसे सुधार सकता है। यह फैसला कानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी संकेत देता है कि इस तरह के मामलों को गंभीरता से लें, खासकर जब नाबालिगों की बात हो।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या यह शादी ज़बरदस्ती और बिना सहमति की थी?
- हां, कोर्ट ने माना कि इसे दोबारा सुनना ज़रूरी है।
- क्या शादी के समय दोनों पक्ष नाबालिग थे?
- हां, दस्तावेज़ों से स्पष्ट है कि दोनों की उम्र कानूनी सीमा से कम थी।
- क्या फैमिली कोर्ट ने जरूरी दस्तावेजों को अनदेखा किया?
- हां, स्कूल प्रमाणपत्र और एफआईआर की अनदेखी की गई।
- क्या मामला फिर से सुना जाएगा?
- हां, फैमिली कोर्ट को दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया है।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और धारा 12 का संदर्भ।
मामले का शीर्षक
Miscellaneous Appeal No.733 of 2018
केस नंबर
Miscellaneous Appeal No.733 of 2018
उद्धरण (Citation)– 2025 (1) PLJR 47
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. बी. पी. डी. सिंह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
श्री राजेश रंजन – अपीलकर्ताओं की ओर से
प्रतिवादी की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ
निर्णय का लिंक
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