निर्णय की सरल व्याख्या
पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 1992 में भागलपुर जिले के भटोरिया गांव में हुई एक हत्या के मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। यह मामला लगभग तीन दशक पुराना था, जिसमें मृतक की पत्नी और बेटी की गवाही के आधार पर निचली अदालत ने कई लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी थी।
घटना के अनुसार, 5-6 अगस्त 1992 की रात करीब 1 बजे, मृतक अपने घर के बरामदे में चारपाई पर सो रहा था। अभियोजन के अनुसार, कई लोग हथियारों से लैस होकर उसके घर में घुसे और उसे गोली मार दी और तेजधार हथियारों से वार किया। मृतक के भाई ने घटना की प्राथमिकी दर्ज कराई और बताया कि ज़मीनी विवाद को लेकर यह हमला किया गया।
हालांकि, जब मामला ट्रायल में पहुँचा, तो मृतक के भाई और अन्य करीबी गवाहों ने अदालत में यह कहकर अपने बयान बदल दिए कि उन्होंने हमलावरों को नहीं देखा था। सिर्फ मृतक की पत्नी और बेटी ने दावा किया कि उन्होंने घटना को देखा और हमलावरों की पहचान की।
अदालत ने पाया कि इन दोनों गवाहों के बयान में कई विरोधाभास थे। जैसे कि पत्नी ने कहा कि वह मौके पर मौजूद थी और उसे भी चोट आई थी, पर न तो उसका मेडिकल रिपोर्ट पेश किया गया और न ही प्राथमिक सूचना में उसका नाम गवाह के रूप में दर्ज था। जांच अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि उसने सिर्फ एक चारपाई देखी, जबकि दोनों गवाहों ने दो चारपाइयों की बात कही थी।
इसके अलावा, जहां घटना के समय अंधेरा था, वहां लैंप जलने की बात कही गई, पर लैंप को जब्त नहीं किया गया। फर्दबयान में कहा गया था कि मृतक बरामदे में मारा गया, लेकिन शव आंगन में मिला — यह एक महत्वपूर्ण विरोधाभास था।
इन सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि हत्या अभियुक्तों ने ही की और उनका जुड़ाव घटना से है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में इस बात को दोहराता है कि अभियुक्त को केवल शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। हर आपराधिक मामले में अभियोजन की जिम्मेदारी होती है कि वह सबूतों के आधार पर आरोप साबित करे। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि अदालतें गवाहों के विरोधाभासी और अविश्वसनीय बयानों को गंभीरता से जांचती हैं। बिहार के आम नागरिकों के लिए यह भरोसा देता है कि न्यायालय केवल ठोस सबूतों पर ही फैसला देती है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या अभियोजन अभियुक्तों का दोष संदेह से परे सिद्ध कर सका?
❌ नहीं। सबूतों में विरोधाभास और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। - क्या मृतक की पत्नी और बेटी की गवाही विश्वसनीय थी?
❌ नहीं। अदालत ने उनके घटनास्थल पर मौजूद रहने पर संदेह जताया। - क्या घटना की जगह और तरीका साबित हो सका?
❌ नहीं। बरामदे में हत्या का दावा था, पर शव आंगन में मिला।
मामले का शीर्षक
Sk. Jabir & Others बनाम बिहार राज्य
केस नंबर
Criminal Appeal (DB) No. 114 of 1995 (साथ में Criminal Appeal (DB) Nos. 120 और 158 of 1995)
उद्धरण (Citation)
2020 (1) PLJR 27
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति हेमंत कुमार श्रीवास्तव
माननीय श्री न्यायमूर्ति राजेन्द्र कुमार मिश्रा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- श्री ज़ेयाउल होदा, अधिवक्ता – अपीलकर्ता (अपील संख्या 114/1995)
- श्री बक्सी एस.आर.पी. सिन्हा (वरिष्ठ अधिवक्ता) और श्री ज़ेयाउल होदा – अपीलकर्ता (158/1995)
- श्री अंसुल, अधिवक्ता – अपीलकर्ता (120/1995)
- श्री दिलीप कुमार सिन्हा, श्री एस.एन. प्रसाद, श्री एस.सी. मिश्रा (राज्य पक्ष के लिए)
निर्णय का लिंक
https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NSMxMTQjMTk5NSMxI04=-a3FfckAgn0I=
“यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।”


