“भरण-पोषण के अधिकार पर न्याय का निर्णय: पति-पत्नी के बीच आर्थिक न्याय की ओर एक कदम”

 

यह मामला पटना उच्च न्यायालय में भोलाभास्कर बनाम डॉली के बीच एक अंतरिम भरण-पोषण (maintenance) के आदेश को चुनौती देने से संबंधित है। भोलाभास्कर (याचिकाकर्ता) ने न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने प्रधान न्यायाधीश, शेखपुरा द्वारा 26 फरवरी 2019 को पारित आदेश को चुनौती दी। इस आदेश में डॉली (प्रत्युत्तरकर्ता) को ₹8,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता का पक्ष:

  1. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उनकी पत्नी डॉली एक स्वतंत्र रूप से कमाने वाली महिला हैं। उन्होंने दावा किया कि डॉली सिलाई और कढ़ाई का काम करती हैं और ₹15,000 प्रति माह कमा रही हैं। इस आधार पर, उन्होंने कहा कि डॉली को भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं है।
  2. याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि वे कोटक महिंद्रा बैंक, पुणे में कार्यरत हैं और उनका मासिक वेतन ₹46,497 है। उन्होंने कहा कि उनके ऊपर पहले से ही अन्य आर्थिक जिम्मेदारियां हैं।
  3. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने तलाक का मुकदमा (Matrimonial Divorce Case No. 20 of 2018) दायर किया है, जो विचाराधीन है। इसलिए, अंतरिम भरण-पोषण का दावा उनकी दृष्टि में वैध नहीं है।

प्रत्युत्तरकर्ता (डॉली) का पक्ष:

  1. डॉली ने याचिका में कहा कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं और उनकी आजीविका चलाने के लिए उन्हें अपने पति की सहायता की आवश्यकता है।
  2. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके पति उनकी आर्थिक स्थिति के प्रति पूरी तरह से लापरवाह हैं और भरण-पोषण देने से बच रहे हैं।
  3. डॉली ने दावा किया कि उनके पति की मासिक आय ₹75,000 है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उन्हें कोई वित्तीय सहायता प्रदान नहीं की।

न्यायालय का अवलोकन और निर्णय:

  1. न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने यह दावा किया था कि डॉली ₹15,000 प्रति माह कमा रही हैं, लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
  2. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल तलाकशुदा पत्नी को ही नहीं, बल्कि ऐसी पत्नी, जिसके खिलाफ तलाक का मुकदमा चल रहा है, वह भी भरण-पोषण पाने की हकदार है।
  3. अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क कि डॉली कमाती हैं, केवल एक अस्पष्ट दावा है, और इसका समर्थन करने के लिए कोई प्रमाणिक दस्तावेज या सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता ने अपनी आय को स्वयं स्वीकार किया और अपने वेतन की पर्ची (Salary Slip) भी प्रस्तुत की, जिससे उनकी आय ₹46,497 प्रति माह साबित हुई।
  4. न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का आदेश देने में न तो कोई कानूनी त्रुटि है और न ही कोई अनुचितता। डॉली को ₹8,000 प्रति माह भरण-पोषण देना याचिकाकर्ता की आय और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उचित और न्यायसंगत है।

अंतिम आदेश:

न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और प्रधान न्यायाधीश, शेखपुरा द्वारा पारित आदेश को सही ठहराया।

इस मामले का व्यापक महत्व:

  1. यह मामला स्पष्ट करता है कि भरण-पोषण का अधिकार केवल तलाकशुदा पत्नियों तक सीमित नहीं है। यदि पति-पत्नी के बीच तलाक का मामला विचाराधीन है, तो पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
  2. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी आत्मनिर्भर नहीं है और पति की आय पर्याप्त है, तो भरण-पोषण का आदेश उचित है।
  3. पति द्वारा केवल आरोप लगाना कि पत्नी कमाती है, बिना ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए, अदालत में मान्य नहीं होगा।

इस प्रकार, यह मामला महिलाओं के अधिकारों और भरण-पोषण से जुड़े कानूनी पहलुओं को उजागर करता है।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NDQjODUzIzIwMTkjMSNO-gYMQX–ak1–MJToQ=

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