पटना उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया, जिसमें मोहम्मद वसीम रज़ा नामक एक उम्मीदवार ने उर्दू शिक्षक की नियुक्ति प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं को चुनौती दी। यह मामला पूर्णिया जिले के के. नगर ब्लॉक से जुड़ा था, जहाँ कैंप साक्षात्कार के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही थी।
मामले की शुरुआत तब हुई जब याचिकाकर्ता वसीम रज़ा, जिनके अंक प्रतिवादी संख्या 10 से अधिक थे, को यह कहते हुए नियुक्ति नहीं दी गई कि जब उनका नाम पुकारा गया, वे उपस्थित नहीं थे। सामान्य श्रेणी में उर्दू शिक्षक के पद के लिए 92 उम्मीदवार थे, लेकिन साक्षात्कार के दिन केवल एक उम्मीदवार को उपस्थित दिखाया गया, जो अपने आप में संदेहजनक था।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि साक्षात्कार स्थल पर अव्यवस्था थी और उन्होंने नोडल अधिकारी की तलाश की, लेकिन वे नहीं मिले। उन्होंने अधिकारियों को टेलीफोन पर शिकायत की और बाद में जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। न्यायाधिकरण ने पाया कि याचिकाकर्ता का दावा वास्तविक है और उन्हें प्रतिवादी संख्या 10 को हटाकर उर्दू शिक्षक के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया।
हालांकि, प्रतिवादी संख्या 10 ने इस निर्णय को राज्य अपीलीय प्राधिकरण में चुनौती दी। राज्य प्राधिकरण ने पाया कि जिला न्यायाधिकरण का यह निष्कर्ष कि याचिकाकर्ता साक्षात्कार के समय उपस्थित था, किसी ठोस सबूत पर आधारित नहीं था। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि शुरुआत में शिकायत प्रतिवादी संख्या 10 के खिलाफ नहीं बल्कि प्रतिवादी संख्या 11 (मरगूब क़मर) के खिलाफ की गई थी।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिया। पहला, बेरोजगारी के इस दौर में 92 आवेदकों में से केवल एक का उपस्थित होना अजीब लगता है। दूसरा, टेलीफोनिक शिकायत को याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता, खासकर जब साक्षात्कार स्थल पर अव्यवस्था थी और नोडल अधिकारी उपलब्ध नहीं थे।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दो महत्वपूर्ण साक्ष्यों – एक अन्य विषय के उम्मीदवार का शपथ पत्र और पंचायत समिति के एक सदस्य का बयान – को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। राज्य अपीलीय न्यायाधिकरण ने जिला न्यायाधिकरण के निष्कर्ष के एक हिस्से को तो स्वीकार किया, लेकिन दूसरे हिस्से को बिना कोई कारण बताए नजरअंदाज कर दिया।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कैंप साक्षात्कार में अंकों का प्रतिशत नियुक्ति के लिए प्रासंगिक नहीं होता, क्योंकि प्रक्रिया के अनुसार उम्मीदवारों के नाम तीन बार पुकारे जाते हैं, लेकिन जब एक अखबार की रिपोर्ट में प्रक्रिया में अनियमितता की बात सामने आई और अधिक अंक वाले उम्मीदवार को केवल इस आधार पर नजरअंदाज कर दिया गया कि वह उपस्थित नहीं था, जबकि उसका दावा है कि वह पूरी तरह से मौजूद था लेकिन उसका नाम कभी नहीं पुकारा गया, तो यह स्थिति स्वीकार करना मुश्किल है।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए, न्यायालय ने जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण और राज्य अपीलीय न्यायाधिकरण के आदेशों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि उक्त ब्लॉक में उर्दू शिक्षक की नियुक्ति के लिए उसी प्रक्रिया से एक नई प्रक्रिया आयोजित की जाए, जिसमें साक्षात्कार की तिथि और प्रक्रिया के बारे में सभी को सूचित किया जाए।
यह निर्णय तीन महत्वपूर्ण संदेश देता है। पहला, नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक है। दूसरा, उच्च योग्यता वाले उम्मीदवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। तीसरा, प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संदिग्ध परिस्थितियों में न्यायालय पुनः प्रक्रिया का आदेश दे सकता है।
न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर पूरी की जाए। इस बीच, उक्त ब्लॉक में उर्दू शिक्षक की नियुक्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखी जाए।
यह फैसला शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है और साथ ही यह भी बताता है कि न्यायपालिका किस प्रकार नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।
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