भूमिका:
यह मामला काशिश कंस्ट्रक्शन बनाम बिहार सरकार से संबंधित है, जिसमें बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग द्वारा ठेके की रद्दीकरण प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता काशिश कंस्ट्रक्शन ने 2019 में बक्सर जिले के दुमरांव में एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के निर्माण का ठेका प्राप्त किया था। हालांकि, विभिन्न प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनों के कारण निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं हो सका, जिसके चलते सरकार ने ठेका रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि ठेका बिना स्वतंत्र निर्णय लिए, उच्च अधिकारियों के निर्देशों पर रद्द किया गया, जो अनुबंध शर्तों और न्यायसंगत प्रक्रिया के खिलाफ है।
मामले की मुख्य बातें:
- क्या कार्य में देरी ठेका रद्द करने का पर्याप्त आधार थी?
- क्या ठेका रद्द करने का निर्णय सही प्रक्रिया का पालन करके लिया गया था?
- क्या कार्य में देरी के पीछे सरकार की जिम्मेदारी भी थी?
मामले की पृष्ठभूमि:
बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने 2017 में दुमरांव, बक्सर में एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के निर्माण के लिए टेंडर निकाला।
- काशिश कंस्ट्रक्शन को सबसे कम बोली लगाने के आधार पर ठेका मिला।
- 27 जुलाई 2017 को कार्यादेश जारी किया गया और 18 महीने में निर्माण कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा गया।
- हालांकि, साइट संबंधित समस्याओं और प्रशासनिक देरी के कारण, काम शुरू नहीं हो सका।
- 14 अगस्त 2019 को सरकार ने एक नया कार्यादेश जारी किया और अक्टूबर 2019 में एक नया अनुबंध हुआ।
निर्माण में आई बाधाएं:
याचिकाकर्ता (काशिश कंस्ट्रक्शन) ने दावा किया कि कार्य में देरी के पीछे निम्नलिखित कारण थे:
- निर्माण स्थल की अनुपलब्धता – कंपनी को समय पर साइट उपलब्ध नहीं कराई गई।
- परिवहन मार्ग की समस्या – निर्माण स्थल तक पहुंचने के लिए कोई उपयुक्त सड़क नहीं थी।
- संरचनात्मक नक्शा (ड्राइंग) देर से मिला – तकनीकी डिजाइन और नक्शे में देरी के कारण निर्माण प्रभावित हुआ।
- कोविड-19 महामारी का असर – लॉकडाउन के कारण श्रमिकों और सामग्री की उपलब्धता बाधित हुई।
इन सभी कारणों के बावजूद, सरकार ने 6 नवंबर 2020 को ठेका रद्द करने का आदेश दिया, जिसे 24 नवंबर 2020 को कार्यपालक अभियंता (Executive Engineer) ने लागू किया।
याचिकाकर्ता (काशिश कंस्ट्रक्शन) का पक्ष:
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ठेका रद्द करने का आदेश कानूनी रूप से गलत था:
- ठेका कार्यपालक अभियंता (Executive Engineer) द्वारा रद्द किया गया था, लेकिन यह आदेश मुख्य अभियंता (Chief Engineer) के निर्देश पर दिया गया था।
- अनुबंध शर्तों के अनुसार, केवल कार्यपालक अभियंता स्वतंत्र रूप से ठेका रद्द कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया।
- इसका अर्थ यह हुआ कि निर्णय सरकारी दबाव में लिया गया, न कि कानूनी आधार पर।
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निर्माण में देरी सरकार की लापरवाही से हुई:
- यदि सरकार निर्माण स्थल समय पर उपलब्ध कराती, सड़क निर्माण करवाती और तकनीकी योजनाएं समय पर देती, तो कार्य तय समय पर पूरा हो सकता था।
- कोविड-19 जैसी असाधारण परिस्थितियों को भी नजरअंदाज कर दिया गया।
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अनुबंध शर्तों का उल्लंघन हुआ:
- अनुबंध की धारा 3 और 14 में स्पष्ट किया गया था कि किसी भी ठेकेदार को सुनवाई का अवसर दिए बिना ठेका रद्द नहीं किया जा सकता।
- लेकिन, कंपनी को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया।
बिहार सरकार का पक्ष:
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काशिश कंस्ट्रक्शन ने समय पर कार्य पूरा नहीं किया:
- सरकार का दावा था कि कंपनी को कई बार चेतावनी दी गई थी कि वह निर्माण कार्य तेज करे, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।
- बार-बार निर्देशों की अनदेखी के कारण ठेका रद्द करना अनिवार्य हो गया।
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सरकार ने वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया:
- ठेका रद्द करने का निर्णय विभागीय निर्देशों और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत लिया गया।
- सरकार ने दावा किया कि निर्माण में देरी के कारण सरकारी परियोजना को भारी नुकसान हुआ।
पटना हाईकोर्ट का फैसला:
1. ठेका रद्द करने की प्रक्रिया गैर-कानूनी थी
- कार्यपालक अभियंता ने कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया, बल्कि सिर्फ उच्च अधिकारी के निर्देशों का पालन किया।
- यह न्यायपालिका के “स्वतंत्र निर्णय” (Independent Judgment) के सिद्धांत के खिलाफ था।
- अतः 24 नवंबर 2020 का ठेका रद्द करने का आदेश अवैध घोषित किया गया।
2. निर्माण में देरी का जिम्मेदार कौन?
- कोर्ट ने माना कि सरकार ने साइट, रोड और डिजाइन संबंधी समस्याओं को हल करने में देरी की।
- यह ठेकेदार की नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही थी।
3. अनुबंध शर्तों का उल्लंघन
- अनुबंध के अनुसार, निर्णय लेने वाले अधिकारी को ठेका रद्द करने से पहले स्वतंत्र रूप से सोचने और जांच करने का अधिकार था।
- लेकिन, सिर्फ उच्च अधिकारियों के आदेश पर ठेका रद्द करना अवैध था।
4. कोर्ट का आदेश:
- 24 नवंबर 2020 को जारी किया गया ठेका रद्द करने का आदेश रद्द किया गया।
- काशिश कंस्ट्रक्शन को कानूनी राहत दी गई और परियोजना को लेकर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
निष्कर्ष:
- पटना हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी अनुबंध को खत्म करने के लिए सही प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
- सरकारी अधिकारियों को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए, सिर्फ उच्च अधिकारियों के दबाव में नहीं।
- इस फैसले से सरकारी ठेकेदारों को राहत मिली, क्योंकि अब वे मनमाने तरीके से ठेका रद्द होने के खिलाफ अपील कर सकते हैं।
भविष्य में असर:
✅ सरकारी अनुबंधों में पारदर्शिता बढ़ेगी।
✅ ठेकेदारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।
✅ सरकार को परियोजनाओं में देरी के कारणों पर अधिक ध्यान देना होगा।
क्या यह फैसला बिहार में ठेकेदारी व्यवस्था में बदलाव लाएगा?
- यह मामला अनुबंध कानूनों में एक मिसाल बनेगा।
- सरकारी विभागों को किसी भी अनुबंध को खत्म करने से पहले उचित कारण और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
- निर्माण कंपनियों को सरकार के खिलाफ अपील करने का एक मजबूत आधार मिलेगा।
यह फैसला सरकारी अनुबंधों और न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMjc5NyMyMDIxIzEjTg==-yMkoVPGhGE8=


